Tuesday, June 23, 2020

Dainik Bhaskar शादी के दस साल बाद तक हम मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे तक में गए। खूब पूजा-पाठ किया। मिन्नतें कीं। एक ही कामना था कि कैसे भी घर में बच्चा आ जाए। लोग हमें अलग-अलग जगह जाने की सलाह देते थे। कोई किसी मंदिर का पता बताता था तो कोई इबादत के लिए मस्जिद में जाने को बोलता था। हमने सब किया तब कहीं जाकर शादी के दस साल बाद अंकुश पैदा हुआ था। मां-बाप ने खूब मिन्नतें की थीं, तब कहीं जाकर उनके घर किलकारियां गूंजी थीं। यह कहते हुए गलवान में शहीद हुए अंकुश ठाकुर के पिता और रिटायर्ड फौजी अनिल ठाकुर का गला भर आया। बोले, साहब 1988 में मेरी शादी हुई थी और अंकुश का जन्म 24 नवंबर 1998 को हुआ। मैंने अपनी दस साल की नौकरी में सेना से जो कमाया था, वो तो इसी में खर्च कर दिया था कि मेरे घर में भी बच्चे की किलकारियां गूंजे। मेरी पत्नी को भी मां बनने का सुख मिले और मेरा परिवार भी आगे बढ़े। दस साल बाद बच्चा पैदा हुआ था, इसलिए अंकुश घर में बहुत लाड़ले थे। सब उन्हें प्यार करते थे। बड़ी मुश्किलों के बाद हमारे घर में खुशियां आई थीं। 1998 में जब अंकुश का जन्म हुआ, तब मेरी पोस्टिंग मेरठ में थी। 2002 में धर्मशाला आया और 2003 में 17 साल 6 महीने सेना में सेवा देने के बाद मैं रिटायर हो गया। घर की माली हालत खराब थी इसलिए 2005 में डिफेंस सिक्योरिटी कोर(डीएससी) ज्वॉइन कर ली थी, ताकि मेरा बच्चा अच्छे से पढ़-लिख सके। अंकुश में सेना में जाने का बहुत जुनून था। पिताजी के मना करने पर भी उन्होंने कह दिया था कि मैं सेना में ही जाऊंगा। अंकुश पढ़ने में भी बहुत तेज था लेकिन न जानें क्यों उसमें शुरू से ही सेना में जाने का जुनून और जोश था। मैं नहीं चाहता था कि वो सेना में जाए। मैंने सोचा कि बड़ी मिन्नतों के बाद तो पैदा हुआ है, लेकिन उसने साफ कह दिया था कि मैं सेना में ही जाऊंगा। उसका फौलादी इरादा देखकर मैंने भी फिर उसे मना नहीं किया। उसने तो सेना में जाने की कसम खा रही थी। परिवार से 20 मई को आखिरी बार अंकुश की बात हो पाई थी। 12वीं के बाद उसने बीएससी में एडमिशन लिया। दूसरी बार में ही भर्ती में उसका सिलेक्शन हो गया था। जनवरी 2019 में उसने सेना ज्वॉइन की थी। अंकुश के सिलेक्शन के वक्त हमारे गांव कडोहता में 16 साल बाद ऐसा हुआ था कि गांव का कोई लड़का सेना में भर्ती होने में कामयाब हुआ है। पहले हमारे गांव में हर घर से लड़के सेना में ही जाते थे। मैं सेना में रहा। मेरे पिताजी सेना में थे। शायद हमारे खून में ही सेना में भर्ती होना लिखा है। परिवार जवान बेटे की शादी के लिए लड़की की तलाश में था लेकिन पलभर में खुशी, मातम में बदल गई। सेना में जाने के बाद भी अंकुश ने पढ़ाई करना नहीं छोड़ा था। वो कमांडिंग अफसर बनना चाहता था। मेरी उससे आखिरी बार बात 20 मई को हुई थी। तब उसने बताया था कि, चीन से कुछ टेंशन चल रही है और हालात अभी ठीक नहीं हैं। इसके बाद मैंने उससे कई बार बात करने की कोशिश की लेकिन बात हो ही नहीं सकी। 16 जून को सीधे उसके शहीद होने की खबर ही मुझे मिली। अंकुश को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। इस दौरान सेना के अफसर मौजूद थे। दूसरा बेटा 12 साल का है, वो भी सेना में जाना चाहता है अंकुश के पिता अनिल कहते हैं कि अंकुश के जन्म के दस साल बाद हमारे घर दूसरा बेटा 2008 में हुआ। वो सातवीं क्लास में है, लेकिन अभी से ही सेना में जाना चाहता है। कहता है मुझे सेना में ही जाना है। मैं उसे भी नहीं रोकना चाहता। अंकुश की शहादत पर मुझे गर्व है। उसने हमारे पूरे गांव का नाम रोशनकिया है। अंकुश को श्रद्धांजलि देने के लिए उनके घर पर भीड़ उमड़ पड़ी थी। ऐसा पहली बार हुआ है, जब हमारे गांव से किसी ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। अब गांव का एक स्कूल उसके नाम से जाना जाएगा। अस्पताल में उसका स्मारक बनेगा। इससे नए लड़के प्रेरणा लेंगे और सेना में जाने के लिए मोटिवेट होंगे। 19 जून को अंकुश पंचतत्व में विलीन हो गए। पूरे सैन्य सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें Ladakh Galwan Valley Martyr Ankush Thakur From Himachal Pradesh Hamirpur Updates; Shaheed Father Speaks To Dainik Bhaskar अक्षय बाजपेयी,2020-01-20.jpg,1781 https://ift.tt/3fPm1Nk https://ift.tt/2Ytqi3m Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf सेना में भर्ती होने के बाद पढ़ाई नहीं छोड़ी थी, वो कमांडिंग ऑफिसर बनना चाहता था

शादी के दस साल बाद तक हम मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे तक में गए। खूब पूजा-पाठ किया। मिन्नतें कीं। एक ही कामना था कि कैसे भी घर में बच्चा आ जाए। लोग हमें अलग-अलग जगह जाने की सलाह देते थे। कोई किसी मंदिर का पता बताता था तो कोई इबादत के लिए मस्जिद में जाने को बोलता था। हमने सब किया तब कहीं जाकर शादी के दस साल बाद अंकुश पैदा हुआ था।

मां-बाप ने खूब मिन्नतें की थीं, तब कहीं जाकर उनके घर किलकारियां गूंजी थीं।

यह कहते हुए गलवान में शहीद हुए अंकुश ठाकुर के पिता और रिटायर्ड फौजी अनिल ठाकुर का गला भर आया। बोले, साहब 1988 में मेरी शादी हुई थी और अंकुश का जन्म 24 नवंबर 1998 को हुआ। मैंने अपनी दस साल की नौकरी में सेना से जो कमाया था, वो तो इसी में खर्च कर दिया था कि मेरे घर में भी बच्चे की किलकारियां गूंजे। मेरी पत्नी को भी मां बनने का सुख मिले और मेरा परिवार भी आगे बढ़े।

दस साल बाद बच्चा पैदा हुआ था, इसलिए अंकुश घर में बहुत लाड़ले थे। सब उन्हें प्यार करते थे।

बड़ी मुश्किलों के बाद हमारे घर में खुशियां आई थीं। 1998 में जब अंकुश का जन्म हुआ, तब मेरी पोस्टिंग मेरठ में थी। 2002 में धर्मशाला आया और 2003 में 17 साल 6 महीने सेना में सेवा देने के बाद मैं रिटायर हो गया। घर की माली हालत खराब थी इसलिए 2005 में डिफेंस सिक्योरिटी कोर(डीएससी) ज्वॉइन कर ली थी, ताकि मेरा बच्चा अच्छे से पढ़-लिख सके।

अंकुश में सेना में जाने का बहुत जुनून था। पिताजी के मना करने पर भी उन्होंने कह दिया था कि मैं सेना में ही जाऊंगा।

अंकुश पढ़ने में भी बहुत तेज था लेकिन न जानें क्यों उसमें शुरू से ही सेना में जाने का जुनून और जोश था। मैं नहीं चाहता था कि वो सेना में जाए। मैंने सोचा कि बड़ी मिन्नतों के बाद तो पैदा हुआ है, लेकिन उसने साफ कह दिया था कि मैं सेना में ही जाऊंगा। उसका फौलादी इरादा देखकर मैंने भी फिर उसे मना नहीं किया। उसने तो सेना में जाने की कसम खा रही थी।

परिवार से 20 मई को आखिरी बार अंकुश की बात हो पाई थी।

12वीं के बाद उसने बीएससी में एडमिशन लिया। दूसरी बार में ही भर्ती में उसका सिलेक्शन हो गया था। जनवरी 2019 में उसने सेना ज्वॉइन की थी। अंकुश के सिलेक्शन के वक्त हमारे गांव कडोहता में 16 साल बाद ऐसा हुआ था कि गांव का कोई लड़का सेना में भर्ती होने में कामयाब हुआ है। पहले हमारे गांव में हर घर से लड़के सेना में ही जाते थे। मैं सेना में रहा। मेरे पिताजी सेना में थे। शायद हमारे खून में ही सेना में भर्ती होना लिखा है।

परिवार जवान बेटे की शादी के लिए लड़की की तलाश में था लेकिन पलभर में खुशी, मातम में बदल गई।

सेना में जाने के बाद भी अंकुश ने पढ़ाई करना नहीं छोड़ा था। वो कमांडिंग अफसर बनना चाहता था। मेरी उससे आखिरी बार बात 20 मई को हुई थी। तब उसने बताया था कि, चीन से कुछ टेंशन चल रही है और हालात अभी ठीक नहीं हैं। इसके बाद मैंने उससे कई बार बात करने की कोशिश की लेकिन बात हो ही नहीं सकी। 16 जून को सीधे उसके शहीद होने की खबर ही मुझे मिली।

अंकुश को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। इस दौरान सेना के अफसर मौजूद थे।

दूसरा बेटा 12 साल का है, वो भी सेना में जाना चाहता है
अंकुश के पिता अनिल कहते हैं कि अंकुश के जन्म के दस साल बाद हमारे घर दूसरा बेटा 2008 में हुआ। वो सातवीं क्लास में है, लेकिन अभी से ही सेना में जाना चाहता है। कहता है मुझे सेना में ही जाना है। मैं उसे भी नहीं रोकना चाहता। अंकुश की शहादत पर मुझे गर्व है। उसने हमारे पूरे गांव का नाम रोशनकिया है।

अंकुश को श्रद्धांजलि देने के लिए उनके घर पर भीड़ उमड़ पड़ी थी।

ऐसा पहली बार हुआ है, जब हमारे गांव से किसी ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। अब गांव का एक स्कूल उसके नाम से जाना जाएगा। अस्पताल में उसका स्मारक बनेगा। इससे नए लड़के प्रेरणा लेंगे और सेना में जाने के लिए मोटिवेट होंगे। 19 जून को अंकुश पंचतत्व में विलीन हो गए। पूरे सैन्य सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई।



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Ladakh Galwan Valley Martyr Ankush Thakur From Himachal Pradesh Hamirpur Updates; Shaheed Father Speaks To Dainik Bhaskar


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Dainik Bhaskar नेशनल स्पोर्ट्स अवॉर्ड से जुड़ी सेल्फ नॉमिनेशन प्रोसेस से खिलाड़ी नाखुश हैं और वे इसे खत्म करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि खेल मंत्रालय इंटरनेशनल मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों का खुद सिलेक्शन करे और फिर उन्हें खेल रत्न या अर्जुन अवॉर्ड दिया जाए।अभी अवॉर्ड के लिए खिलाड़ियों को खुदअपना फॉर्म खेल मंत्रालय को भेजना होता है। वर्ल्ड बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में सिल्वर जीतने वाले देश के पहले पुरुष मुक्केबाज अमित पंघाल अवॉर्ड की सिलेक्शन प्रोसेस को भेदभावपूर्ण बता चुके हैं। उन्होंने हाल ही में सिलेक्शन प्रोसेस बदलने को लेकर खेल मंत्री किरन रिजिजू को चिठ्ठी लिखी थी। इसमें उन्होंने कहा था कि सिलेक्शन सिस्टम को ऐसा बनाए जाए कि किसी खिलाड़ी को अवॉर्ड केगिड़गिड़ाना न पड़े। ओलिंपिक मेडल जीत चुके रेसलर योगेश्वर दत्त, मुक्केबाज मनोज कुमार और डिस्कस थ्रो की खिलाड़ी कृष्णा पूनिया भी अमित की बात का समर्थन कर रहे हैं। सेल्फ नॉमिनेशन की प्रक्रिया हो खत्म 2012 के लंदन ओलिंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाले रेसलर योगेश्वर दत्त का कहना है कि स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) और स्पोर्ट्स फेडरेशन के पास खिलाड़ियों के प्रदर्शन का पूरा रिकॉर्ड होता है।ऐसे मेंखेल मंत्रालय खिलाड़ियों से आवेदन मंगाने की बजाएप्रदर्शन के आधार पर उन्हें अर्जुन अवॉर्ड या खेल रत्न दे। अवॉर्ड के लिए नई पॉलिसी की जरूरत 2013 में खेल रत्न न मिलने पर विरोध जताने वालीएथलीट कृष्णा पूनिया ने भास्कर को बताया कि मौजूदा पॉलिसी में बदलाव की जरूरत है। उनके मुताबिक, इन पुरस्कारों के लिए एक कमेटी बनाई जानी चाहिए, जिसमेंसभी ओलिंपिक और नॉन ओलिंपिक खेलों के प्रतिनिधि शामिल हों, ताकि सिलेक्शन के समय किसी भी खिलाड़ी के साथ अन्याय न हो। खेल रत्न और अर्जुन पुरस्कार के लिए नियम नेशनल स्पोर्ट्स अवॉर्ड के लिए खिलाड़ियों का सिलेक्शन हर चार साल के प्रदर्शन के आधार पर होता है। इसके लिए पॉइंट सिस्टम बनाया गया है। ओलिंपिक, वर्ल्ड चैम्पियनशिप में गोल्ड जीतने पर 40, सिल्वरपर 30 और ब्रॉन्ज जीतने पर 20 पॉइंट मिलते हैं। 2014 में हाई कोर्टके निर्देश के बाद ओलिंपिक और पैरालिंपिक मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों को अवॉर्ड के लिए आवेदन करने की जरूरत नहीं है। खेल मंत्रालय खुद इनके नाम की सिफारिश करता है,बशर्ते उन्हें पहले से यह पुरस्कार न मिला हो। अवॉर्ड को लेकर खिलाड़ी कोर्ट का सहारा भी ले चुके ऐसा पहली बार नहीं है, जब अवॉर्ड प्रोसेस शुरू होने के साथ ही सवाल उठे हैं। 2014 में बॉक्सर मनोज कुमार सिलेक्शन कमेटी द्वारा नजरअंदाज होने पर दिल्ली हाई कोर्ट गए थे। तब कोर्ट के आदेश पर उन्हें अर्जुन अवॉर्ड मिला था। वहीं, पिछले साल खेल रत्न हासिल करने वाले रेसलर बजरंग पूनिया ने 2018 में सर्वोच्च खेल पुरस्कार ने मिलने पर कोर्ट जाने की धमकी दी थी। तब विराट कोहली और वेटलिफ्टर मीराबाई चानू को खेल रत्न मिला था। पॉइंट में अव्वल के बाद भी पिछड़ गए थे बजरंग नेशनल स्पोर्ट्स अवॉर्ड के लिए तय किए गए पॉइंट सिस्टम के मुताबिक, रेसलर बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट के 2018 में 80 अंक थे, जबकि मीराबाई चानू के 44 पॉइंट थे। क्रिकेट में ओलिंपिक या वर्ल्ड चैम्पियनशिप जैसे टूर्नामेंट नहीं होने की वजह सेकोहलीके खाते में एक भी अंक नहीं था। तब पूनिया ने यहसवाल उठाया था कि जब उनके सबसे ज्यादा अंक थे, तो फिर उन्हें खेल रत्न के लिए क्यों नहीं चुना गया? खेल रत्न के बाद अर्जुन पुरस्कार के लिए नाम भेजने पर उठेसवाल वेटलिफ्टर मीराबाई चानू और रेसलर साक्षी मलिक का नाम इस साल अर्जुन पुरस्कार के लिए भेजा गया है। इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं,क्योंकि इन दोनों एथलीट को पहले ही देश के सबसे बड़े खेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। साक्षी को 2016 में, तो मीराबाई को 2018 में खेल रत्न मिला था। ऐसे में अर्जुन अवॉर्ड के लिए इनका नाम भेजना किसी के गले नहीं उतर रहा। हालांकि, नियमों के तहत खेल रत्न जीतने के बाद भी खिलाड़ी अर्जुन अवॉर्ड के लिए नाम भेज सकता है। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें National Sports Award Khel Ratna And Arjuna Awards| Players raises question over Self nomination process and demands overall change in awards selection process राजकिशोर,rajkishor.png,1924 https://ift.tt/37UyegY https://ift.tt/2BAJsei Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf खिलाड़ियों की मांग- सेल्फ नॉमिनेशन प्रोसेस खत्म हो, खेल मंत्रालय खुद इंटरनेशनल मेडल जीतने वाले प्लेयर्स का सिलेक्शन कर अवॉर्ड दे

नेशनल स्पोर्ट्स अवॉर्ड से जुड़ी सेल्फ नॉमिनेशन प्रोसेस से खिलाड़ी नाखुश हैं और वे इसे खत्म करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि खेल मंत्रालय इंटरनेशनल मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों का खुद सिलेक्शन करे और फिर उन्हें खेल रत्न या अर्जुन अवॉर्ड दिया जाए।अभी अवॉर्ड के लिए खिलाड़ियों को खुदअपना फॉर्म खेल मंत्रालय को भेजना होता है।

वर्ल्ड बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में सिल्वर जीतने वाले देश के पहले पुरुष मुक्केबाज अमित पंघाल अवॉर्ड की सिलेक्शन प्रोसेस को भेदभावपूर्ण बता चुके हैं। उन्होंने हाल ही में सिलेक्शन प्रोसेस बदलने को लेकर खेल मंत्री किरन रिजिजू को चिठ्ठी लिखी थी। इसमें उन्होंने कहा था कि सिलेक्शन सिस्टम को ऐसा बनाए जाए कि किसी खिलाड़ी को अवॉर्ड केगिड़गिड़ाना न पड़े।

ओलिंपिक मेडल जीत चुके रेसलर योगेश्वर दत्त, मुक्केबाज मनोज कुमार और डिस्कस थ्रो की खिलाड़ी कृष्णा पूनिया भी अमित की बात का समर्थन कर रहे हैं।

सेल्फ नॉमिनेशन की प्रक्रिया हो खत्म
2012 के लंदन ओलिंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाले रेसलर योगेश्वर दत्त का कहना है कि स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) और स्पोर्ट्स फेडरेशन के पास खिलाड़ियों के प्रदर्शन का पूरा रिकॉर्ड होता है।ऐसे मेंखेल मंत्रालय खिलाड़ियों से आवेदन मंगाने की बजाएप्रदर्शन के आधार पर उन्हें अर्जुन अवॉर्ड या खेल रत्न दे।

अवॉर्ड के लिए नई पॉलिसी की जरूरत
2013 में खेल रत्न न मिलने पर विरोध जताने वालीएथलीट कृष्णा पूनिया ने भास्कर को बताया कि मौजूदा पॉलिसी में बदलाव की जरूरत है। उनके मुताबिक, इन पुरस्कारों के लिए एक कमेटी बनाई जानी चाहिए, जिसमेंसभी ओलिंपिक और नॉन ओलिंपिक खेलों के प्रतिनिधि शामिल हों, ताकि सिलेक्शन के समय किसी भी खिलाड़ी के साथ अन्याय न हो।

खेल रत्न और अर्जुन पुरस्कार के लिए नियम
नेशनल स्पोर्ट्स अवॉर्ड के लिए खिलाड़ियों का सिलेक्शन हर चार साल के प्रदर्शन के आधार पर होता है। इसके लिए पॉइंट सिस्टम बनाया गया है। ओलिंपिक, वर्ल्ड चैम्पियनशिप में गोल्ड जीतने पर 40, सिल्वरपर 30 और ब्रॉन्ज जीतने पर 20 पॉइंट मिलते हैं।

2014 में हाई कोर्टके निर्देश के बाद ओलिंपिक और पैरालिंपिक मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों को अवॉर्ड के लिए आवेदन करने की जरूरत नहीं है। खेल मंत्रालय खुद इनके नाम की सिफारिश करता है,बशर्ते उन्हें पहले से यह पुरस्कार न मिला हो।

अवॉर्ड को लेकर खिलाड़ी कोर्ट का सहारा भी ले चुके
ऐसा पहली बार नहीं है, जब अवॉर्ड प्रोसेस शुरू होने के साथ ही सवाल उठे हैं। 2014 में बॉक्सर मनोज कुमार सिलेक्शन कमेटी द्वारा नजरअंदाज होने पर दिल्ली हाई कोर्ट गए थे। तब कोर्ट के आदेश पर उन्हें अर्जुन अवॉर्ड मिला था। वहीं, पिछले साल खेल रत्न हासिल करने वाले रेसलर बजरंग पूनिया ने 2018 में सर्वोच्च खेल पुरस्कार ने मिलने पर कोर्ट जाने की धमकी दी थी। तब विराट कोहली और वेटलिफ्टर मीराबाई चानू को खेल रत्न मिला था।

पॉइंट में अव्वल के बाद भी पिछड़ गए थे बजरंग
नेशनल स्पोर्ट्स अवॉर्ड के लिए तय किए गए पॉइंट सिस्टम के मुताबिक, रेसलर बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट के 2018 में 80 अंक थे, जबकि मीराबाई चानू के 44 पॉइंट थे। क्रिकेट में ओलिंपिक या वर्ल्ड चैम्पियनशिप जैसे टूर्नामेंट नहीं होने की वजह सेकोहलीके खाते में एक भी अंक नहीं था।

तब पूनिया ने यहसवाल उठाया था कि जब उनके सबसे ज्यादा अंक थे, तो फिर उन्हें खेल रत्न के लिए क्यों नहीं चुना गया?

खेल रत्न के बाद अर्जुन पुरस्कार के लिए नाम भेजने पर उठेसवाल
वेटलिफ्टर मीराबाई चानू और रेसलर साक्षी मलिक का नाम इस साल अर्जुन पुरस्कार के लिए भेजा गया है। इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं,क्योंकि इन दोनों एथलीट को पहले ही देश के सबसे बड़े खेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

साक्षी को 2016 में, तो मीराबाई को 2018 में खेल रत्न मिला था। ऐसे में अर्जुन अवॉर्ड के लिए इनका नाम भेजना किसी के गले नहीं उतर रहा। हालांकि, नियमों के तहत खेल रत्न जीतने के बाद भी खिलाड़ी अर्जुन अवॉर्ड के लिए नाम भेज सकता है।



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Dainik Bhaskar पुरुषों में कोरोना से मौत का खतरा भले ही महिलाओं से ज्यादा हो लेकिन शरीर में एंटीबॉडी बनने के मामले में ये आगे हैं। ब्रिटेन की सबसे बड़ी स्वास्थ्य एजेंसी एनएचएस के मुताबिक, कोरोना से संक्रमित पुरुषों में महिलाओं के मुकाबले एंटीबॉडी अधिक बनती है। हाल ही में इस पर रिसर्च की गई। शोध का लक्ष्य यह पता लगाना था कि कोरोना सर्वाइर के ब्लड प्लाज्मा को संक्रमित मरीजों में चढ़ाया जाए तो एंटीबॉडी वायरस से लड़ने में कितनी मददगार साबित होती है। उनमें इम्युनिटी का स्तर कितना बढ़ता है। एनएचएस नेशुरू किया था थैरेपी प्रोग्राम एनएचएस ने हाल ही में कोरोना के मरीजों के लिए ब्लड एंड ट्रांसप्लांट प्रोग्राम शुरू किया था। ट्रायल के दौरान सामने आया कि संक्रमित पुरुषों में 43 फीसदी और महिलाओं में 29 फीसदी एंटीबॉडी विकसित हुईं। एनएचएस कोरोना सर्वाइवर से ब्लड प्लाज्मा डोनेट करने की अपील कर रहा है ताकि इन्हें कोरोना के मरीजों में चढ़ाकर इम्यून रेस्पॉन्स को समझा जा सके। अधिक जानें बचाई जा सकेंगी ब्लड एंड ट्रांसप्लांट प्रोग्राम के एसोसिएट डायरेक्टर प्रो. डेविड रॉबर्ट्स के मुताबिक, इस समय में प्लाज्मा डोनर्स की जरूरत है। हम प्लाज्मा डोनेट करने वालों की जांच करते हैं। पुरुषों में एंटीबॉडी का स्तर अधिक मिला है, इसका मतलब है कि हम ज्यादालोगों को जान बचा सकते हैं। ज्यादा बीमार होने पर इम्यून सिस्टम को अधिक एंटीबॉडी पैदा करने की जरूरत पड़ती है। एंटीबॉडी इसलिए है जरूरी प्रो. डेविड के मुताबिक, संक्रमण की शुरुआत में आपका इम्यून सिस्टम श्वेत रक्त कोशिकाओं के साथ मिलकर वायरस को मारने की कोशिश करता है। लेकिन जब आप अधिक बीमार हो जाते हैं तो इम्यून सिस्टम को अधिक एंटीबॉडी पैदा करने की जरूरत पड़ती है ताकि वायरस को खत्म किया जा सके। इसलिए यह प्रोग्राम बेहद अहम है। कोरोना मरीजों कोप्लाज्मा थैरेपी दी जा सकेगी प्रो. डेविड के मुताबिक, हमारी और दुनियाभर में हुई स्टडी के मुताबिक, कोविड-19 का संक्रमण पुरुषों में अधिक हो रहा है। इसलिए अगर पुरुष प्लाज्मा डोनेट करते हैं तो इनके रिकवर होने की सम्भावना भी ज्यादा है। पिछले हफ्ते कोरोना पॉजिटिव मरीजों को इस ब्लड प्लाज्मा ट्रायल प्रोग्राम में शामिल होने के लिए कहा गया था। अगर यह ट्रायल पूरी तरह से सफल होता है तो ब्रिटेन के अस्पतालों में प्लाज्मा थैरेपी शुरू दी जा सकेगी। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें कोरोना मरीजों में जितनी ज्यादा एंटीबॉडी विकसित होंगी वायरस से लड़ना उतना आसान होगा। दैनिक भास्कर,,1733 https://ift.tt/3ewHPgC https://ift.tt/2Yt3SiD Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf पुरुषों के शरीर में 14% ज्यादा एंटीबॉडी बन रहीं, इन्हें महिलाओं के मुकाबले खतरा ज्यादा, लेकिन इम्युनिटी में आगे हैं

पुरुषों में कोरोना से मौत का खतरा भले ही महिलाओं से ज्यादा हो लेकिन शरीर में एंटीबॉडी बनने के मामले में ये आगे हैं। ब्रिटेन की सबसे बड़ी स्वास्थ्य एजेंसी एनएचएस के मुताबिक, कोरोना से संक्रमित पुरुषों में महिलाओं के मुकाबले एंटीबॉडी अधिक बनती है।

हाल ही में इस पर रिसर्च की गई। शोध का लक्ष्य यह पता लगाना था कि कोरोना सर्वाइर के ब्लड प्लाज्मा को संक्रमित मरीजों में चढ़ाया जाए तो एंटीबॉडी वायरस से लड़ने में कितनी मददगार साबित होती है। उनमें इम्युनिटी का स्तर कितना बढ़ता है।

एनएचएस नेशुरू किया था थैरेपी प्रोग्राम
एनएचएस ने हाल ही में कोरोना के मरीजों के लिए ब्लड एंड ट्रांसप्लांट प्रोग्राम शुरू किया था। ट्रायल के दौरान सामने आया कि संक्रमित पुरुषों में 43 फीसदी और महिलाओं में 29 फीसदी एंटीबॉडी विकसित हुईं।

एनएचएस कोरोना सर्वाइवर से ब्लड प्लाज्मा डोनेट करने की अपील कर रहा है ताकि इन्हें कोरोना के मरीजों में चढ़ाकर इम्यून रेस्पॉन्स को समझा जा सके।

अधिक जानें बचाई जा सकेंगी
ब्लड एंड ट्रांसप्लांट प्रोग्राम के एसोसिएट डायरेक्टर प्रो. डेविड रॉबर्ट्स के मुताबिक, इस समय में प्लाज्मा डोनर्स की जरूरत है। हम प्लाज्मा डोनेट करने वालों की जांच करते हैं।

पुरुषों में एंटीबॉडी का स्तर अधिक मिला है, इसका मतलब है कि हम ज्यादालोगों को जान बचा सकते हैं।

ज्यादा बीमार होने पर इम्यून सिस्टम को अधिक एंटीबॉडी पैदा करने की जरूरत पड़ती है।

एंटीबॉडी इसलिए है जरूरी
प्रो. डेविड के मुताबिक, संक्रमण की शुरुआत में आपका इम्यून सिस्टम श्वेत रक्त कोशिकाओं के साथ मिलकर वायरस को मारने की कोशिश करता है। लेकिन जब आप अधिक बीमार हो जाते हैं तो इम्यून सिस्टम को अधिक एंटीबॉडी पैदा करने की जरूरत पड़ती है ताकि वायरस को खत्म किया जा सके। इसलिए यह प्रोग्राम बेहद अहम है।

कोरोना मरीजों कोप्लाज्मा थैरेपी दी जा सकेगी

प्रो. डेविड के मुताबिक, हमारी और दुनियाभर में हुई स्टडी के मुताबिक, कोविड-19 का संक्रमण पुरुषों में अधिक हो रहा है। इसलिए अगर पुरुष प्लाज्मा डोनेट करते हैं तो इनके रिकवर होने की सम्भावना भी ज्यादा है।

पिछले हफ्ते कोरोना पॉजिटिव मरीजों को इस ब्लड प्लाज्मा ट्रायल प्रोग्राम में शामिल होने के लिए कहा गया था। अगर यह ट्रायल पूरी तरह से सफल होता है तो ब्रिटेन के अस्पतालों में प्लाज्मा थैरेपी शुरू दी जा सकेगी।



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कोरोना मरीजों में जितनी ज्यादा एंटीबॉडी विकसित होंगी वायरस से लड़ना उतना आसान होगा।


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Dainik Bhaskar कोरोना के डर से पेंगोलिन और अन्य दुर्लभ जानवरों पर प्रतिबंध लगाने के बादचीन में अब करीब डेढ़ फुटलंबे बैम्बू रेट्स को मारा जा रहा है। चीनी सरकार ने देश में जंगली जानवरों का व्यापार करने और इन्हें खाने पर पाबंदी लगा दी है। डेली मेल और द ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक, कोरोना का संक्रमण फैलने की कड़ी में बैम्बू रेट्स कानाम सामने आने पर देश में ये बड़ा कदम उठाया गया है। यहां केहुबेई प्रांत के एक फार्म मेंपहली खेप में1.6 टन चूहों को दफनाकरखत्म किए जाने का वीडियो सामने आया है। बैम्बू रेट्स खास तरह के मोटेचूहे होते हैं, यहां के लोग मानते हैं कि इसे खाने से ताकत बढ़ती है और इसमें काफी मात्रा में पोषक तत्व होते हैं। इन चूहों का प्रयोग चीनी चिकित्सा में बड़े पैमाने परकिया जाता है। किसानों से लेकर चूहों का कत्ल हो रहा :चीन में महामारी के केंद्र रहे हुबेई प्रांत के शियानन शहर में हाल ही में 900 बैम्बू रेट्स को दफनाया गया। ये चूहे स्थानीय किसान ने पाले थे, जिससे ये बरामद किए गए और कार्रवाई हुई। चूहों के अलावा 7 सेही को मारा गया, जिसका वजन 140 किलो था। चूहों को मारने से पहले इन पर लाइम पाउडर छिड़का गया ताकि संक्रमण का खतरा कम हो। बांस के तने में रहते हैं ये चूहे :चीनी बैम्बू रैट्स को 'झू सू' के नाम से भी जाना जाता है। ये लम्बे और मोटे होते हैं। ये जंगलों में मौजूद बांस के तनों में अपना घर बनाकर रहते हैं, इसलिए इनका नाम बैम्बू रेट्स पड़ा। इनका वजन 5 किलो तक होता है। चीनी बैम्बू रैट्स की लम्बाई 17 इंच तक होती है। चीनी दवाओं में होता है प्रयोग :बैम्बू रेट्स का इस्तेमाल चीन की परंपरागत चिकित्सा में होता है। चिकित्सा पद्धति का मानना है कि इन चूहों का मीट खाने से शरीर से जहरीले तत्व निकल जाते हैं। पद्धति के मुताबिक इसे खाने सेपेट और तिल्ली यानी स्प्लीन की कार्यक्षमता बेहतर होती है। चीन के किसानों को इन चूहों का व्यापार करने पर अच्छी कमाई होती है, इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में इन्हें अधिक पाला जाता है। चूहे की डिशेज हैं चीन में फेम :चूहे के व्यवसाय से जुड़े झुसू का कहना है कि एक जिंदा बैम्बू रैट्स की कीमत 10 हजार रुपए तक हो सकती है। एक किलो ग्रिल्ड किया हुआ चूहा 3 हजार रुपए तक मिलता है। झुसू के ब्रीडिंग फोरम के ऑनलाइन पेज में इस चूहे को 30 तरह से तैयार करने की रेसिपी बताई गई हैं। इसे रोस्ट, गिल्स, फ्राई और सूप में पकाकर तैयार किया जा रहा है। इसकी डिशेज चीन में फेमस हैं। चीन में जानवरों की भूमिका पर उठे सवाल :दिसम्बर में वुहान के बाजार से ही कोरोना फैलने की बात सामने आने के बाद कई बार जानवरों के व्यापार और चीन में इन्हें खाए जाने पर सवाल उठाए गए हैं। चीन के महामारी विशेषज्ञा डॉ. झॉन्ग नेनशन का कहना है कि अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वायरस का सोर्स क्या है। कई एक्सपर्ट्स महामारी को फैलाने में चमगादड़ और पैंगोलिन की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं। जानवरों से जुड़ी गाइडलाइन जारी हुई थी : दक्षिणी चीन में जंगली जानवरों की फार्मिंग को लेकर गाइडलाइन जारी की गई थी। गाइडलाइन के मुताबिक, किसानों से जब्त किए गए जानवरों को वापस जंगलों में छोड़ा जाएगा या इनका इस्तेमाल रिसर्च में किया जाएगा। इंसान को कोई जानवर सौंपते समय सावधानी बरती जाएगी। ऐसे जानवर जिनसे संक्रमण का खतरा है उन्हें मार दिया जाएगा। किसानों को क्षतिपूर्ति के तौर पर 430 रुपए से लेकर 21 हजार रुपए प्रति जानवर तक दिया जाएगा। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें China Coronavirus News Updates; Chinese Bamboo Rat Killed Due To Fear Of Virus Infection दैनिक भास्कर,,1733 https://ift.tt/31mBgJR https://ift.tt/2BCqKmU Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf चीन में मारे जा रहे डेढ़ फुट के बैम्बू रेट्स, इन 5 किलो वजनी चूहों को यहां ताकत बढ़ाने के लिए खाया जाता है

कोरोना के डर से पेंगोलिन और अन्य दुर्लभ जानवरों पर प्रतिबंध लगाने के बादचीन में अब करीब डेढ़ फुटलंबे बैम्बू रेट्स को मारा जा रहा है। चीनी सरकार ने देश में जंगली जानवरों का व्यापार करने और इन्हें खाने पर पाबंदी लगा दी है।

डेली मेल और द ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक, कोरोना का संक्रमण फैलने की कड़ी में बैम्बू रेट्स कानाम सामने आने पर देश में ये बड़ा कदम उठाया गया है। यहां केहुबेई प्रांत के एक फार्म मेंपहली खेप में1.6 टन चूहों को दफनाकरखत्म किए जाने का वीडियो सामने आया है।

बैम्बू रेट्स खास तरह के मोटेचूहे होते हैं, यहां के लोग मानते हैं कि इसे खाने से ताकत बढ़ती है और इसमें काफी मात्रा में पोषक तत्व होते हैं। इन चूहों का प्रयोग चीनी चिकित्सा में बड़े पैमाने परकिया जाता है।

किसानों से लेकर चूहों का कत्ल हो रहा :चीन में महामारी के केंद्र रहे हुबेई प्रांत के शियानन शहर में हाल ही में 900 बैम्बू रेट्स को दफनाया गया। ये चूहे स्थानीय किसान ने पाले थे, जिससे ये बरामद किए गए और कार्रवाई हुई। चूहों के अलावा 7 सेही को मारा गया, जिसका वजन 140 किलो था। चूहों को मारने से पहले इन पर लाइम पाउडर छिड़का गया ताकि संक्रमण का खतरा कम हो।
बांस के तने में रहते हैं ये चूहे :चीनी बैम्बू रैट्स को 'झू सू' के नाम से भी जाना जाता है। ये लम्बे और मोटे होते हैं। ये जंगलों में मौजूद बांस के तनों में अपना घर बनाकर रहते हैं, इसलिए इनका नाम बैम्बू रेट्स पड़ा। इनका वजन 5 किलो तक होता है। चीनी बैम्बू रैट्स की लम्बाई 17 इंच तक होती है।
चीनी दवाओं में होता है प्रयोग :बैम्बू रेट्स का इस्तेमाल चीन की परंपरागत चिकित्सा में होता है। चिकित्सा पद्धति का मानना है कि इन चूहों का मीट खाने से शरीर से जहरीले तत्व निकल जाते हैं। पद्धति के मुताबिक इसे खाने सेपेट और तिल्ली यानी स्प्लीन की कार्यक्षमता बेहतर होती है। चीन के किसानों को इन चूहों का व्यापार करने पर अच्छी कमाई होती है, इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में इन्हें अधिक पाला जाता है।
चूहे की डिशेज हैं चीन में फेम :चूहे के व्यवसाय से जुड़े झुसू का कहना है कि एक जिंदा बैम्बू रैट्स की कीमत 10 हजार रुपए तक हो सकती है। एक किलो ग्रिल्ड किया हुआ चूहा 3 हजार रुपए तक मिलता है। झुसू के ब्रीडिंग फोरम के ऑनलाइन पेज में इस चूहे को 30 तरह से तैयार करने की रेसिपी बताई गई हैं। इसे रोस्ट, गिल्स, फ्राई और सूप में पकाकर तैयार किया जा रहा है। इसकी डिशेज चीन में फेमस हैं।
चीन में जानवरों की भूमिका पर उठे सवाल :दिसम्बर में वुहान के बाजार से ही कोरोना फैलने की बात सामने आने के बाद कई बार जानवरों के व्यापार और चीन में इन्हें खाए जाने पर सवाल उठाए गए हैं। चीन के महामारी विशेषज्ञा डॉ. झॉन्ग नेनशन का कहना है कि अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वायरस का सोर्स क्या है। कई एक्सपर्ट्स महामारी को फैलाने में चमगादड़ और पैंगोलिन की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं।
जानवरों से जुड़ी गाइडलाइन जारी हुई थी : दक्षिणी चीन में जंगली जानवरों की फार्मिंग को लेकर गाइडलाइन जारी की गई थी। गाइडलाइन के मुताबिक, किसानों से जब्त किए गए जानवरों को वापस जंगलों में छोड़ा जाएगा या इनका इस्तेमाल रिसर्च में किया जाएगा। इंसान को कोई जानवर सौंपते समय सावधानी बरती जाएगी। ऐसे जानवर जिनसे संक्रमण का खतरा है उन्हें मार दिया जाएगा। किसानों को क्षतिपूर्ति के तौर पर 430 रुपए से लेकर 21 हजार रुपए प्रति जानवर तक दिया जाएगा।


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Dainik Bhaskar कुछ दिन पहले मेरी एक सहेली का पचासवां जन्मदिन था। इस शुभ दिन बचपन की साथियों ने जूम कॉल अरेंज किया ताकि हम उसे बधाई दे सकें। साथ ही पुरानी यादों वाली फोटो इकट्‌ठी की गईं, जिसमें खासकर ‘बर्थडे पार्टी’ वाले कई सुनहरे पल देखने को मिले। पैसों की कमी भी थी और साधन भी उपलब्ध नहीं थे। फिर भी बर्थडे एक ऐसा सेलिब्रेशन था, जहां मजा तो आता था, मगर साथ इकट्‌ठे होने का, सिंपल और टेस्टी खाने का। मुड़कर देखा तो वो, समय जिसमें टीवी पर दो ही चैनल थे, आज के अनलिमिडेट केबल से ज्यादा सुनहरा लगा। कम था, मगर एक-दूसरे का साथ था। गर्मी की छुटि्टयों में कहां जाना है? अपनी दादी या नानी के घर। मजा शुरू होता था सफर से, जब ट्रेन में हम बोरिया-बिस्तर और ट्रंक लेकर चढ़ते थे। स्टेशन पर उतरो तो कोई परिवारजन रिसीव करने जरूर आता था। टैक्सी तो छोड़ो मेरे होमटाउन रतलाम में रिक्शा भी नहीं चलता था। हम लोग तांगे में बैठकर जाते थे। एक सरप्राइज ट्रंक में सिर्फ तकिए, चादर, गद्दे भरे हुए थे, जो रात में बाहर आते थे। एडजस्ट कर के सब खुशी-खुशी सो जाते थे। किसी को उम्मीद नहीं थी कि मुझे अपने बिस्तर मिलें। चाचा-बुआ-मामा-मासी के कच्चे-बच्चे इतने कि हमउम्र साथी की कोई कमी नहीं। हां छोटे-मोटे झगड़े भी खूब, मगर प्यार भी। शादी अटेंड करने का अंदाज भी अलग था। मेरी बुआजी की शादी हुई तो ना किसी हॉल, ना होटल में। हमारे घर के सामने टेंट लगा था (हां, एक दिन के लिए परिवार ने सड़क पर कब्जा कर लिया)। मैं मानती हूं, आज के सिविक सेंस और नियमों के हिसाब से ऐसा अलाउ नहीं होगा। रतलाम में 25 साल पहलेे तांगे बंद हो गए। एक तो रिक्शे और टेम्पो का चलन, दूसरी तरफ शायद आज मैं ही न बैठूं। क्योंकि एनिमल क्रूएलिटी के मुद्दे पर मैं सतर्क हूं, जागरूक हूं। क्या मैं ओटले पर, पतले से गद्दे पर पतली से चादर लेकर सो सकती हूं? मुश्किल है। इस बदन को ऐशो-आराम की आदत पढ़ गई है। खाने में रोज दाल-चावल, लौकी, भिंडी से भी बोर हो जाऊंगी। जीभ अलग-अलग प्रांतों और देशों का भ्रमण करने की शौकीन जो हो गई है। शायद हर पीढ़ी को बचपन के दिन ज्यादा ही शानदार लगते हैं। क्योंकि वो एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो है, जिसे हम अपने दिमाग के पेंटबॉक्स से खूब रंगीन बना सकते हैं। लेकिन कहीं न कहीं एक चाहत भी है कि चलो प्रोग्रेस तो जरूरी है। पर उस मुकाम पर बढ़ते हुए शायद हमने बहुत कुछ खो दिया है। आज क्या आपका ऐसा कोई दोस्त है, जिसके घर आप बिना निमंत्रण, यूं ही टपक सकते हो? कोई ऐसा रिश्तेदार, जो ये न पूछे कि भाई रिटर्न टिकट कब का है। कोरोना ने दुनिया को अपने कब्जे में किया है, तो दूसरी तरफ अकेलापन भी इतना फैल गया कि किसी के जाने के बाद ही पता चलता है कि आदमी कितना दुखी था। आज सोशल मीडिया के नाम पर आपके 500 दोस्त हो सकते हैं, मगर जब जरूरत है, तो एक भी अपना नहीं। फेसबुक पर सिर्फ हंसते-खेलते फोटो मिलेंगे, जबकि डॉक्टर कहते हैं कि डिप्रेशन की बीमारी घर-घर में है। पर इस बीमारी की पहचान और इलाज पर ध्यान आज भी कॉमन नहीं है। बच्चा स्कूल में एल्जेब्रा और जियोमेट्री तो सीखता है, पर अपने मन को शांत और स्थिर रखने का फॉर्मूला नहीं, घर में, दफ्तर में, जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। अपने अंदर क्रोध या उदासी के इमोशन को समझना और सुलझाना। कचरा जैसे घर से रोज निकलता है, मन का कचरा भी उसी तरह फेंक दें। किसी ने कुछ कह दिया तो उसे जिंदगीभर का बोझ बना कर न चलें। हमें मालूम नहीं, उनके फेसबुक की स्माइलिंग फोटो के पीछे क्या गम हैं। वो इंसान भी प्यार का भूखा है। मगर क्या हम खुद इतने कंप्लीट हैं कि दूसरों की तरफ ध्यान दे सकें? घर आपका बड़ा है, पर दिल कितना बड़ा है, इसपर गौर करें। (ये लेखिका के अपने विचार हैं) आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर दैनिक भास्कर,,1733 https://ift.tt/2CsGQ2C https://ift.tt/3drnV59 Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf कोरोना के समय में डिप्रेशन और अकेलापन नई समस्या बन रहा है, इससे लड़ने के लिए मन को शांत रखने का फॉर्मूला भी सीखें

कुछ दिन पहले मेरी एक सहेली का पचासवां जन्मदिन था। इस शुभ दिन बचपन की साथियों ने जूम कॉल अरेंज किया ताकि हम उसे बधाई दे सकें। साथ ही पुरानी यादों वाली फोटो इकट्‌ठी की गईं, जिसमें खासकर ‘बर्थडे पार्टी’ वाले कई सुनहरे पल देखने को मिले। पैसों की कमी भी थी और साधन भी उपलब्ध नहीं थे। फिर भी बर्थडे एक ऐसा सेलिब्रेशन था, जहां मजा तो आता था, मगर साथ इकट्‌ठे होने का, सिंपल और टेस्टी खाने का।

मुड़कर देखा तो वो, समय जिसमें टीवी पर दो ही चैनल थे, आज के अनलिमिडेट केबल से ज्यादा सुनहरा लगा। कम था, मगर एक-दूसरे का साथ था। गर्मी की छुटि्टयों में कहां जाना है? अपनी दादी या नानी के घर। मजा शुरू होता था सफर से, जब ट्रेन में हम बोरिया-बिस्तर और ट्रंक लेकर चढ़ते थे। स्टेशन पर उतरो तो कोई परिवारजन रिसीव करने जरूर आता था।

टैक्सी तो छोड़ो मेरे होमटाउन रतलाम में रिक्शा भी नहीं चलता था। हम लोग तांगे में बैठकर जाते थे। एक सरप्राइज ट्रंक में सिर्फ तकिए, चादर, गद्दे भरे हुए थे, जो रात में बाहर आते थे। एडजस्ट कर के सब खुशी-खुशी सो जाते थे। किसी को उम्मीद नहीं थी कि मुझे अपने बिस्तर मिलें। चाचा-बुआ-मामा-मासी के कच्चे-बच्चे इतने कि हमउम्र साथी की कोई कमी नहीं। हां छोटे-मोटे झगड़े भी खूब, मगर प्यार भी।

शादी अटेंड करने का अंदाज भी अलग था। मेरी बुआजी की शादी हुई तो ना किसी हॉल, ना होटल में। हमारे घर के सामने टेंट लगा था (हां, एक दिन के लिए परिवार ने सड़क पर कब्जा कर लिया)। मैं मानती हूं, आज के सिविक सेंस और नियमों के हिसाब से ऐसा अलाउ नहीं होगा। रतलाम में 25 साल पहलेे तांगे बंद हो गए। एक तो रिक्शे और टेम्पो का चलन, दूसरी तरफ शायद आज मैं ही न बैठूं। क्योंकि एनिमल क्रूएलिटी के मुद्दे पर मैं सतर्क हूं, जागरूक हूं।

क्या मैं ओटले पर, पतले से गद्दे पर पतली से चादर लेकर सो सकती हूं? मुश्किल है। इस बदन को ऐशो-आराम की आदत पढ़ गई है। खाने में रोज दाल-चावल, लौकी, भिंडी से भी बोर हो जाऊंगी। जीभ अलग-अलग प्रांतों और देशों का भ्रमण करने की शौकीन जो हो गई है।

शायद हर पीढ़ी को बचपन के दिन ज्यादा ही शानदार लगते हैं। क्योंकि वो एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो है, जिसे हम अपने दिमाग के पेंटबॉक्स से खूब रंगीन बना सकते हैं। लेकिन कहीं न कहीं एक चाहत भी है कि चलो प्रोग्रेस तो जरूरी है। पर उस मुकाम पर बढ़ते हुए शायद हमने बहुत कुछ खो दिया है।

आज क्या आपका ऐसा कोई दोस्त है, जिसके घर आप बिना निमंत्रण, यूं ही टपक सकते हो? कोई ऐसा रिश्तेदार, जो ये न पूछे कि भाई रिटर्न टिकट कब का है। कोरोना ने दुनिया को अपने कब्जे में किया है, तो दूसरी तरफ अकेलापन भी इतना फैल गया कि किसी के जाने के बाद ही पता चलता है कि आदमी कितना दुखी था।

आज सोशल मीडिया के नाम पर आपके 500 दोस्त हो सकते हैं, मगर जब जरूरत है, तो एक भी अपना नहीं। फेसबुक पर सिर्फ हंसते-खेलते फोटो मिलेंगे, जबकि डॉक्टर कहते हैं कि डिप्रेशन की बीमारी घर-घर में है। पर इस बीमारी की पहचान और इलाज पर ध्यान आज भी कॉमन नहीं है।
बच्चा स्कूल में एल्जेब्रा और जियोमेट्री तो सीखता है, पर अपने मन को शांत और स्थिर रखने का फॉर्मूला नहीं, घर में, दफ्तर में, जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। अपने अंदर क्रोध या उदासी के इमोशन को समझना और सुलझाना।

कचरा जैसे घर से रोज निकलता है, मन का कचरा भी उसी तरह फेंक दें। किसी ने कुछ कह दिया तो उसे जिंदगीभर का बोझ बना कर न चलें। हमें मालूम नहीं, उनके फेसबुक की स्माइलिंग फोटो के पीछे क्या गम हैं। वो इंसान भी प्यार का भूखा है। मगर क्या हम खुद इतने कंप्लीट हैं कि दूसरों की तरफ ध्यान दे सकें? घर आपका बड़ा है, पर दिल कितना बड़ा है, इसपर गौर करें।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर


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Dainik Bhaskar महाभारत के युद्ध में कौरवों की पराजय और पुत्रों की मौत से दुखी गांधारी ने जो कहा वह हज़ारों साल बाद भारत की सुप्रीम कोर्ट का ध्येय वाक्य बन गया। ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ का महाभारत काल में अर्थ था कि जहां कृष्ण हैं, वहीं धर्म है और जहां धर्म है, वहीं विजय है। प्रेमचंद की कहानियों में जजों को भले ही परमेश्वर का दर्ज़ा मिला हो लेकिन आधुनिक गणतंत्र में न्यायाधीश लोग संविधान, नियम और क़ानून की सीमाओं से बंधे हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने पुरी की रथ यात्रा पर रोक लगाते हुए कहा था कि अगर मैं यह आदेश पारित नहीं करता तो मुझे भगवान माफ नहीं करते। अखबारों की हेडलाइन बनीं इन बातों का लिखित आदेश में जिक्र नहीं है। जगन्नाथ यानी जगत के नाथ की ऐसी माया हुई कि 4दिन के भीतर सुप्रीम कोर्ट को फैसला बदल कर रथयात्रा को मंजूरी देनी पड़ी। मध्यकाल में अनेक अड़ंगों के बावजूद इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है जब भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकलने के बावजूद कर्फ्यू की वजह से भक्त घरों में कैद हैं। न्याय की देवी भी गांधारी की तरह आंखों में पट्टी बांधे है, जिससे सभी को समानता से न्याय मिले। सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश के अनुसार गुजरात हाई कोर्ट ने अहमदाबाद में रथयात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को बदलते हुए पुरी में रथ यात्रा की अनुमति दे दी। उसी तर्ज़ पर अहमदाबाद रथ यात्रा के लिए गुजरात हाईकोर्ट द्वारा अनुमति दी जाती तो इससे न्यायिक अनुशासन में ज्यादा बढोतरी होती।   आखिरी समय में डिजिटल अदालतों से हुए इस नाटकीय उलट-पुलट से संविधानके कई प्रावधान नजरअंदाज हुए। संविधान के अनुसार सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में स्थित है और किसी अन्य शहर में इसकी दूसरी पीठ नहीं है। लेकिन इस मामले में चीफ जस्टिस बोबडे नागपुर से सुनवाई, तो याचिकाकर्ता के वकील हरीश साल्वे लंदन से बहस कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट का कोई भी फैसला देश का कानून माना जाता है, जिसे सिर्फ संविधान के अनुच्छेद137के तहत रिव्यू यानी पुनरावलोकन प्रक्रिया या संसद के माध्यम से ही बदल सकते हैं। सात साल पहले जस्टिस राधाकृष्णन और दीपक मिश्रा की बेंच ने एक अहम् फैसला देकर कहा था कि सिविल प्रोसीजर कोड के तहत फैसले की गलतियों को ही सुधारा जा सकता है और इसकी आड़ में पूरे फैसले को बदल नहीं सकते। रथयात्रा को अनुमति देने का नया फैसला स्वागत योग्य है। लेकिन पुराने आदेश को पलटने के लिए संशोधन आदेश पारित करने की जो प्रक्रिया अपनाई गई उसे संवैधानिक तौर पर ठीक नहीं मान सकते। देश की हज़ारों अदालतों में अंग्रेजों के समय के फैसलों के आधार पर अभी भी फैसले दिए जाते हैं। पिछले कुछ सालों में जजों ने अपने ही अनेक फैसलों को कुछ दिनों के भीतर ही पलट दिया। इससे अदालतों की साख कमजोर होने के साथ न्यायिक अराजकता बढ़ने का खतरा बढ़ रहा है। इस पर सरकार और संसद ने भी कई बार चिंता व्यक्त की है। लॉकडाउन के बाद चीफ जस्टिस ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को सुपर गवर्नमेंट की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट से पहले उड़ीसा हाईकोर्ट के सम्मुख याचिका दायर करके रथयात्रा को रोकने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की बेंच ने 9जून को रथयात्रा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। आदेश के पैरा21में हाईकोर्ट ने कहा था कि रथयात्रा जैसे मामलों पर स्थानीय परिस्थिति के अनुसार सरकार को ही फैसले का अधिकार होना चाहिए। लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए गाइडलाइंस के पालन के लिए हाईकोर्ट ने सरकार को जवाबदेह बनाया था। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की बजाय नई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने जल्दबाजी में आदेश पारित कर दिए, जिसकी वजह से फैसले को 4 दिनों के भीतर पलटना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने पुराने आदेश से पुरी की रथ यात्रा से जुडी सभी धार्मिक और सेक्युलर गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। सबरीमाला की तर्ज़ पर रथयात्रा के आदेश पर भी विवाद बढ़ा तो धार्मिक मामलों पर न्यायपालिका के हस्तक्षेप और क्षेत्राधिकार पर नए सवाल खड़े होंगे। कोरोना काल में रथ के निर्माण को अनुमति देने के बावजूद प्रशासन और पुलिस ने अहमदाबाद और पुरी में रथयात्रा को अनुमति देने पर स्पष्ट निर्णय नहीं लिया। सरकारों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में निर्णय लेने में विलंब होने से अदालतों को सुपर गवर्नमेंट की भूमिका में आने में सहूलियत हो जाती है। उसके बाद देर रात की सुनवाई और वॉट्सएप से जारी अदालती फैसलों से आम जनता के साथ प्रशासन की मुश्किलें भी बढ़ती हैं। चीन की घुसपैठ का जवाब देने के लिए अनेक उपायों के साथ ईज़ इज ऑफ डूइंग बिजनेस में क्रांतिकारी सुधार की जरूरत है, जिसमंे अदालतें भी शामिल हैं। अदालतों की अति न्यायिक सक्रियता से संसद और सरकार का रसूख कमजोर होने के साथ निर्णयन और सुधार की प्रक्रिया भी बाधित होती है। पूर्व अटॉर्नी जनरल हरीश साल्वे ने देश में आर्थिक मंदी व जीडीपी में गिरावट के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों को जिम्मेदार बताया है। क़ानून के शासन से भारत को मजबूत बनाने के लिए संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट और अदालतों को अनेक विशिष्ट अधिकार मिले हैं। रथयात्रा की तर्ज़ पर अब न्यायिक सुधार के पहियों को भी तेज गति से आगे बढ़ाया जाए तो जनता और भगवान दोनों खुश होंगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं) आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील। दैनिक भास्कर,,1733 https://ift.tt/2NmYUgK https://ift.tt/2YX0MCs Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf रथयात्रा को अनुमति देने का नया फैसला स्वागत योग्य, लेकिन अदालतों के यू-टर्न से उनकी साख प्रभावित होती है

महाभारत के युद्ध में कौरवों की पराजय और पुत्रों की मौत से दुखी गांधारी ने जो कहा वह हज़ारों साल बाद भारत की सुप्रीम कोर्ट का ध्येय वाक्य बन गया। ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ का महाभारत काल में अर्थ था कि जहां कृष्ण हैं, वहीं धर्म है और जहां धर्म है, वहीं विजय है।

प्रेमचंद की कहानियों में जजों को भले ही परमेश्वर का दर्ज़ा मिला हो लेकिन आधुनिक गणतंत्र में न्यायाधीश लोग संविधान, नियम और क़ानून की सीमाओं से बंधे हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने पुरी की रथ यात्रा पर रोक लगाते हुए कहा था कि अगर मैं यह आदेश पारित नहीं करता तो मुझे भगवान माफ नहीं करते। अखबारों की हेडलाइन बनीं इन बातों का लिखित आदेश में जिक्र नहीं है।

जगन्नाथ यानी जगत के नाथ की ऐसी माया हुई कि 4दिन के भीतर सुप्रीम कोर्ट को फैसला बदल कर रथयात्रा को मंजूरी देनी पड़ी। मध्यकाल में अनेक अड़ंगों के बावजूद इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है जब भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकलने के बावजूद कर्फ्यू की वजह से भक्त घरों में कैद हैं। न्याय की देवी भी गांधारी की तरह आंखों में पट्टी बांधे है, जिससे सभी को समानता से न्याय मिले।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश के अनुसार गुजरात हाई कोर्ट ने अहमदाबाद में रथयात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को बदलते हुए पुरी में रथ यात्रा की अनुमति दे दी। उसी तर्ज़ पर अहमदाबाद रथ यात्रा के लिए गुजरात हाईकोर्ट द्वारा अनुमति दी जाती तो इससे न्यायिक अनुशासन में ज्यादा बढोतरी होती।  
आखिरी समय में डिजिटल अदालतों से हुए इस नाटकीय उलट-पुलट से संविधानके कई प्रावधान नजरअंदाज हुए। संविधान के अनुसार सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में स्थित है और किसी अन्य शहर में इसकी दूसरी पीठ नहीं है। लेकिन इस मामले में चीफ जस्टिस बोबडे नागपुर से सुनवाई, तो याचिकाकर्ता के वकील हरीश साल्वे लंदन से बहस कर रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट का कोई भी फैसला देश का कानून माना जाता है, जिसे सिर्फ संविधान के अनुच्छेद137के तहत रिव्यू यानी पुनरावलोकन प्रक्रिया या संसद के माध्यम से ही बदल सकते हैं। सात साल पहले जस्टिस राधाकृष्णन और दीपक मिश्रा की बेंच ने एक अहम् फैसला देकर कहा था कि सिविल प्रोसीजर कोड के तहत फैसले की गलतियों को ही सुधारा जा सकता है और इसकी आड़ में पूरे फैसले को बदल नहीं सकते।

रथयात्रा को अनुमति देने का नया फैसला स्वागत योग्य है। लेकिन पुराने आदेश को पलटने के लिए संशोधन आदेश पारित करने की जो प्रक्रिया अपनाई गई उसे संवैधानिक तौर पर ठीक नहीं मान सकते। देश की हज़ारों अदालतों में अंग्रेजों के समय के फैसलों के आधार पर अभी भी फैसले दिए जाते हैं।

पिछले कुछ सालों में जजों ने अपने ही अनेक फैसलों को कुछ दिनों के भीतर ही पलट दिया। इससे अदालतों की साख कमजोर होने के साथ न्यायिक अराजकता बढ़ने का खतरा बढ़ रहा है। इस पर सरकार और संसद ने भी कई बार चिंता व्यक्त की है।
लॉकडाउन के बाद चीफ जस्टिस ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को सुपर गवर्नमेंट की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट से पहले उड़ीसा हाईकोर्ट के सम्मुख याचिका दायर करके रथयात्रा को रोकने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की बेंच ने 9जून को रथयात्रा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

आदेश के पैरा21में हाईकोर्ट ने कहा था कि रथयात्रा जैसे मामलों पर स्थानीय परिस्थिति के अनुसार सरकार को ही फैसले का अधिकार होना चाहिए। लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए गाइडलाइंस के पालन के लिए हाईकोर्ट ने सरकार को जवाबदेह बनाया था। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की बजाय नई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने जल्दबाजी में आदेश पारित कर दिए, जिसकी वजह से फैसले को 4 दिनों के भीतर पलटना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने आदेश से पुरी की रथ यात्रा से जुडी सभी धार्मिक और सेक्युलर गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। सबरीमाला की तर्ज़ पर रथयात्रा के आदेश पर भी विवाद बढ़ा तो धार्मिक मामलों पर न्यायपालिका के हस्तक्षेप और क्षेत्राधिकार पर नए सवाल खड़े होंगे।
कोरोना काल में रथ के निर्माण को अनुमति देने के बावजूद प्रशासन और पुलिस ने अहमदाबाद और पुरी में रथयात्रा को अनुमति देने पर स्पष्ट निर्णय नहीं लिया। सरकारों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में निर्णय लेने में विलंब होने से अदालतों को सुपर गवर्नमेंट की भूमिका में आने में सहूलियत हो जाती है। उसके बाद देर रात की सुनवाई और वॉट्सएप से जारी अदालती फैसलों से आम जनता के साथ प्रशासन की मुश्किलें भी बढ़ती हैं।
चीन की घुसपैठ का जवाब देने के लिए अनेक उपायों के साथ ईज़ इज ऑफ डूइंग बिजनेस में क्रांतिकारी सुधार की जरूरत है, जिसमंे अदालतें भी शामिल हैं। अदालतों की अति न्यायिक सक्रियता से संसद और सरकार का रसूख कमजोर होने के साथ निर्णयन और सुधार की प्रक्रिया भी बाधित होती है।

पूर्व अटॉर्नी जनरल हरीश साल्वे ने देश में आर्थिक मंदी व जीडीपी में गिरावट के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों को जिम्मेदार बताया है। क़ानून के शासन से भारत को मजबूत बनाने के लिए संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट और अदालतों को अनेक विशिष्ट अधिकार मिले हैं। रथयात्रा की तर्ज़ पर अब न्यायिक सुधार के पहियों को भी तेज गति से आगे बढ़ाया जाए तो जनता और भगवान दोनों खुश होंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील।


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Dainik Bhaskar क्या वायरल : India in Pixels की तरफ से जारी किया गया एक इंफोग्राफिक। इसमें देश के नक्शे पर चिन्हित करके बताया गया है कि किन-किन राज्यों में कोविड-19 का कम्युनिटी ट्रांसमिशन दस्तक दे सकता है। सबसे ज्यादा खतरा तेलंगाना राज्य में दिखायागया है। नक्शे में हर राज्य के ऊपर एक प्रतिशत लिखा हुआ है। इसी प्रतिशत के आधार पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन के खतरे का आकलन किया गया है। अब ये प्रतिशत कहां से आया? इस प्रतिशत को निकालने के लिए एक फॉर्मूला है, जो नक्शे पर ही लिखा है। दिए गए फॉर्मूले के अनुसार, राज्य में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में से ठीक होने वाले मरीजों की संख्या को घटाना है। फिर इसे 100 से गुणा (मल्टीप्लाई) करना है। अब इस संख्या को क्वारैंटाइन लोगों की संख्या से भाग (डिवाइड) करना है। सोशल मीडिया पर इस नक्शे को शेयर करते हुए कम्युनिटी ट्रांसमिशन कीचेतावनी दी जा रही है https://www.facebook.com/pushpendra.awadhiya.9/posts/10158643429201202 https://www.facebook.com/theUniversityofentertainment/posts/587334278586192 https://twitter.com/vidyasagarallam/status/1275075307855208462 फैक्ट चेक पड़ताल नक्शे पर India in Pixels लिखा हुआ है। हमने इस नाम के पेजसोशल मीडिया पर ढूंढना शुरू किए। इसी नाम का एक फेसबुक पेज मिला, जहां कई आंकड़ों को भारत के नक्शे पर इंफोग्राफिक के रूप में पोस्ट किया जाता है। बड़ी संख्या में लोग इन पोस्ट्स को शेयर भी करते हैं। https://www.facebook.com/indiainpixels कम्युनिटी ट्रांसमिशन वाली फोटो का यहां लंबा स्पष्टीकरण भी दिया गया है। ये स्पष्टीकरण बाद में जोड़ा गया है। क्योंकि इसके आगे एडिटेड लिखा हुआ है। शेयर करने वाले यूजर यदि इसे ही ध्यान से पढ़ लेते। तो न ही इसे सही माना जाता। न ही इसे शेयर किया जाता। डिस्कलेमर में साफ लिखा है कि इस इंफोग्राफिक को देखकर घबराएं नहीं। हम संक्रमण को लेकर कोई दावा नहीं कर रहे हैं। यानी एक तरफ इंफोग्राफिक में लिखा है Risk of Community Transmission। दूसरी तरफ डिस्कलेमर में लिखा है कम्युनिटी ट्रांसमिशन को लेकर कोई दावा नहीं कर रहे हैं। गौर करने वाली बात है कि पहले ये डिस्कलेमर नहीं डाला गया था। पोस्ट सोशल मीडिया पर जब वायरल हो गई उसके बादकैप्शन को एडिट करके स्पष्टीकरण लिखा गया। पहले सीधे तौर पर India in Pixels ने ये दावा किया था कि भारत के इन राज्यों में कोरोना के कम्युनिटी ट्रांसमिशन का खतरा है। पहले पोस्ट किया गया नक्शा। बाद में इसमें स्पष्टीकरण जोड़ा गया। ट्विटर हैंडल पर भी India in Pixels ने मैप कोरीट्वीट करके सफाई दी है। जिसमें लिखा है कि ये फॉर्मूलाकेवल एक मोटे तौर पर किया गया अनुमान है, यह कोई अनुमान नहीं है। तेलंगाना सरकार नेखास तौर पर इस नक्शे को लेकरएक प्रेस नोट जारी किया है। इसमें न सिर्फ कम्युनिटी ट्रांसमिशन के आकलन के लिए उपयोग किए गए फॉर्मूले को बेबुनियाद बताया है। बल्कि इसे तथ्यात्मक रूप से भी गलत कहा है। वायरल नक्शे को लेकर जारी किया गया तेलंगाना सरकार का प्रेस नोट तेलंगाना सरकार के प्रेस नोट में यह भी कहा गया है कि आईसीएमआर पहले ही घोषित कर चुका है कि राज्य में कम्युनिटी ट्रांसमिशन नहीं है। तेलंगाना सरकार ने नक्शे में दिए गएफॉर्मुले के आधार पर राज्य में क्वारैंटाइन मरीजों की संख्या और पॉजिटिव व ठीक होने वाले मरीजों की संख्या का कैलकुलेशन करके बताया है। इस कैलकुलेशन के अनुसार तेलंगाना का आंकड़ा 0.198% होगा। जबकि नक्शे में इसे 122% बताया गया है। हालांकि, ये भी स्पष्ट किया गया है कि इस्तेमाल किया गया फॉर्मूला रेंडम है। जिसका कोई आधार नहीं है। तेलंगाना सरकार के प्रेस नोट का ही एक हिस्सा। इस फॉर्मूले के आधार पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन की दलील में कितनी सच्चाई है। यह जानने के लिए हमने आईसीएमआर के महामारी एवं संक्रमण से जुड़ी बीमारियों के एक विशेषज्ञ से बात की। उन्होंनेबताया कि वर्तमान में वैज्ञानिक डॉ. रेड्‌डी की थ्योरी के आधार पर ही कम्युनिटी ट्रांसमिशन घोषित किया जाता है। वह ये है कि अगर वायरस से संक्रमित 70% मरीजों के संक्रमण की जानकारी ही सरकार के पास न हो, तो वह कम्युनिटी ट्रांसमिशन होगा। इस थ्योरी के आधार परकम्युनिटी ट्रांसमिशन की दस्तक वाली बात भ्रामक है। आईसीएमआर के महामारी विशेषज्ञ ने स्पष्ट कहा : नक्शे में जिन पैमानों पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन की बात कही जा रही है। वह बेबुनियाद हैं। निष्कर्ष :वायरल नक्शे में जिस फॉर्मुले के आधार पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन की बात कही जा रही है। वह निराधार है। तेलंगाना सरकार के साथ ही आइसीएमआर के विशेषज्ञ ने भी इसे सिरे से खारिज कर दिया है। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें The warning of community transmission being given along the map of India is misleading, the government and experts reject it दैनिक भास्कर,,1733 https://ift.tt/2Noa5WD https://ift.tt/3fVgiWr Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf भारत के नक्शे के साथ कम्युनिटी ट्रांसमिशन के अलर्ट वाला वायरल ग्राफिक झूठा, सरकार और विशेषज्ञों ने इसे खारिज किया

क्या वायरल : India in Pixels की तरफ से जारी किया गया एक इंफोग्राफिक। इसमें देश के नक्शे पर चिन्हित करके बताया गया है कि किन-किन राज्यों में कोविड-19 का कम्युनिटी ट्रांसमिशन दस्तक दे सकता है। सबसे ज्यादा खतरा तेलंगाना राज्य में दिखायागया है।

  • नक्शे में हर राज्य के ऊपर एक प्रतिशत लिखा हुआ है। इसी प्रतिशत के आधार पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन के खतरे का आकलन किया गया है। अब ये प्रतिशत कहां से आया? इस प्रतिशत को निकालने के लिए एक फॉर्मूला है, जो नक्शे पर ही लिखा है।
  • दिए गए फॉर्मूले के अनुसार, राज्य में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में से ठीक होने वाले मरीजों की संख्या को घटाना है। फिर इसे 100 से गुणा (मल्टीप्लाई) करना है। अब इस संख्या को क्वारैंटाइन लोगों की संख्या से भाग (डिवाइड) करना है।

सोशल मीडिया पर इस नक्शे को शेयर करते हुए कम्युनिटी ट्रांसमिशन कीचेतावनी दी जा रही है

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फैक्ट चेक पड़ताल

  • नक्शे पर India in Pixels लिखा हुआ है। हमने इस नाम के पेजसोशल मीडिया पर ढूंढना शुरू किए। इसी नाम का एक फेसबुक पेज मिला, जहां कई आंकड़ों को भारत के नक्शे पर इंफोग्राफिक के रूप में पोस्ट किया जाता है। बड़ी संख्या में लोग इन पोस्ट्स को शेयर भी करते हैं।
    https://www.facebook.com/indiainpixels
  • कम्युनिटी ट्रांसमिशन वाली फोटो का यहां लंबा स्पष्टीकरण भी दिया गया है। ये स्पष्टीकरण बाद में जोड़ा गया है। क्योंकि इसके आगे एडिटेड लिखा हुआ है। शेयर करने वाले यूजर यदि इसे ही ध्यान से पढ़ लेते। तो न ही इसे सही माना जाता। न ही इसे शेयर किया जाता।
  • डिस्कलेमर में साफ लिखा है कि इस इंफोग्राफिक को देखकर घबराएं नहीं। हम संक्रमण को लेकर कोई दावा नहीं कर रहे हैं। यानी एक तरफ इंफोग्राफिक में लिखा है Risk of Community Transmission। दूसरी तरफ डिस्कलेमर में लिखा है कम्युनिटी ट्रांसमिशन को लेकर कोई दावा नहीं कर रहे हैं।
  • गौर करने वाली बात है कि पहले ये डिस्कलेमर नहीं डाला गया था। पोस्ट सोशल मीडिया पर जब वायरल हो गई उसके बादकैप्शन को एडिट करके स्पष्टीकरण लिखा गया। पहले सीधे तौर पर India in Pixels ने ये दावा किया था कि भारत के इन राज्यों में कोरोना के कम्युनिटी ट्रांसमिशन का खतरा है।

    पहले पोस्ट किया गया नक्शा। बाद में इसमें स्पष्टीकरण जोड़ा गया।
  • ट्विटर हैंडल पर भी India in Pixels ने मैप कोरीट्वीट करके सफाई दी है। जिसमें लिखा है कि ये फॉर्मूलाकेवल एक मोटे तौर पर किया गया अनुमान है, यह कोई अनुमान नहीं है।
  • तेलंगाना सरकार नेखास तौर पर इस नक्शे को लेकरएक प्रेस नोट जारी किया है। इसमें न सिर्फ कम्युनिटी ट्रांसमिशन के आकलन के लिए उपयोग किए गए फॉर्मूले को बेबुनियाद बताया है। बल्कि इसे तथ्यात्मक रूप से भी गलत कहा है।

  • वायरल नक्शे को लेकर जारी किया गया तेलंगाना सरकार का प्रेस नोट
  • तेलंगाना सरकार के प्रेस नोट में यह भी कहा गया है कि आईसीएमआर पहले ही घोषित कर चुका है कि राज्य में कम्युनिटी ट्रांसमिशन नहीं है।
  • तेलंगाना सरकार ने नक्शे में दिए गएफॉर्मुले के आधार पर राज्य में क्वारैंटाइन मरीजों की संख्या और पॉजिटिव व ठीक होने वाले मरीजों की संख्या का कैलकुलेशन करके बताया है। इस कैलकुलेशन के अनुसार तेलंगाना का आंकड़ा 0.198% होगा। जबकि नक्शे में इसे 122% बताया गया है। हालांकि, ये भी स्पष्ट किया गया है कि इस्तेमाल किया गया फॉर्मूला रेंडम है। जिसका कोई आधार नहीं है।
  • तेलंगाना सरकार के प्रेस नोट का ही एक हिस्सा।
  • इस फॉर्मूले के आधार पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन की दलील में कितनी सच्चाई है। यह जानने के लिए हमने आईसीएमआर के महामारी एवं संक्रमण से जुड़ी बीमारियों के एक विशेषज्ञ से बात की।
  • उन्होंनेबताया कि वर्तमान में वैज्ञानिक डॉ. रेड्‌डी की थ्योरी के आधार पर ही कम्युनिटी ट्रांसमिशन घोषित किया जाता है। वह ये है कि अगर वायरस से संक्रमित 70% मरीजों के संक्रमण की जानकारी ही सरकार के पास न हो, तो वह कम्युनिटी ट्रांसमिशन होगा। इस थ्योरी के आधार परकम्युनिटी ट्रांसमिशन की दस्तक वाली बात भ्रामक है।
  • आईसीएमआर के महामारी विशेषज्ञ ने स्पष्ट कहा : नक्शे में जिन पैमानों पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन की बात कही जा रही है। वह बेबुनियाद हैं।

निष्कर्ष :वायरल नक्शे में जिस फॉर्मुले के आधार पर कम्युनिटी ट्रांसमिशन की बात कही जा रही है। वह निराधार है। तेलंगाना सरकार के साथ ही आइसीएमआर के विशेषज्ञ ने भी इसे सिरे से खारिज कर दिया है।



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The warning of community transmission being given along the map of India is misleading, the government and experts reject it


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Dainik Bhaskar पूर्वी लद्दाख में सीमा पर चीन के साथ तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी की लाेकप्रियता बरकरार है। चीन विवाद पर सी-वोटर स्नैप पोल में लोगों से पूछा गया कि मौजूदा तनाव को लेकर सरकार पर ज्यादा भरोसा है या कांग्रेस पर? सर्वे में शामिल 74% लोगों ने कहा कि उन्हें मोदी सरकार पर पूरा भरोसा है, जबकि सिर्फ 14.4% लोगों ने राहुल गांधी या विपक्ष पर भरोसा जताया। वहीं, 9.6% लोगों ने कहा कि चीन से विवाद निपटाने का दम न तो विपक्ष में है और न ही माैजूदा सरकार में है। 68% ने कहा- लाेग चीन के माल का बहिष्कार करेंगे सर्वेक्षण में शामिल 68% लोगों का मानना है कि भारत के लोग चीनी उत्पादों का बहिष्कार करेंगे, जबकि 31% लाेगाें को लगता है कि लोग चीन से सामान खरीदना जारी रखेंगे, भले ही कुछ भी हो। 60% बोले- चीन से बदला लेना जरूरी है सर्वे में शामिल 68% भारतीयों का कहना है कि पाकिस्तान की तुलना में भारत के लिए चीन बड़ी चिंता का विषय है, जबकि 32% ने पाक को ज्यादा चिंताजनक माना। लाेगाें से जब पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि भारत सरकार ने चीन को जवाब देने के लिए सही कदम उठाए हैं? इस पर 39% से अधिक भारतीयों ने हां में जवाब दिया और कहा कि गलवान घाटी में 20 भारतीय सैनिकाें के शहीद हाेने पर मोदी सरकार ने चीन काे करारा जवाब दिया। 60% का मानना है कि हमारे सैनिकों की हत्या का बदला लिया जाना बाकी है। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें फोटो पिछले साल अक्टूबर की है। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर के राजौरी में जवानों के साथ दिवाली मनाई थी। दैनिक भास्कर,,1733 https://ift.tt/2Z6VdBm https://ift.tt/2NrkssR Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf 68% देशवासियों ने चीन को पाकिस्तान से बड़ा खतरा माना, राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर 74% ने प्रधानमंत्री मोदी पर भरोसा जताया

पूर्वी लद्दाख में सीमा पर चीन के साथ तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी की लाेकप्रियता बरकरार है। चीन विवाद पर सी-वोटर स्नैप पोल में लोगों से पूछा गया कि मौजूदा तनाव को लेकर सरकार पर ज्यादा भरोसा है या कांग्रेस पर? सर्वे में शामिल 74% लोगों ने कहा कि उन्हें मोदी सरकार पर पूरा भरोसा है, जबकि सिर्फ 14.4% लोगों ने राहुल गांधी या विपक्ष पर भरोसा जताया।

वहीं, 9.6% लोगों ने कहा कि चीन से विवाद निपटाने का दम न तो विपक्ष में है और न ही माैजूदा सरकार में है।

68% ने कहा- लाेग चीन के माल का बहिष्कार करेंगे
सर्वेक्षण में शामिल 68% लोगों का मानना है कि भारत के लोग चीनी उत्पादों का बहिष्कार करेंगे, जबकि 31% लाेगाें को लगता है कि लोग चीन से सामान खरीदना जारी रखेंगे, भले ही कुछ भी हो।

60% बोले- चीन से बदला लेना जरूरी है

सर्वे में शामिल 68% भारतीयों का कहना है कि पाकिस्तान की तुलना में भारत के लिए चीन बड़ी चिंता का विषय है, जबकि 32% ने पाक को ज्यादा चिंताजनक माना। लाेगाें से जब पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि भारत सरकार ने चीन को जवाब देने के लिए सही कदम उठाए हैं?

इस पर 39% से अधिक भारतीयों ने हां में जवाब दिया और कहा कि गलवान घाटी में 20 भारतीय सैनिकाें के शहीद हाेने पर मोदी सरकार ने चीन काे करारा जवाब दिया। 60% का मानना है कि हमारे सैनिकों की हत्या का बदला लिया जाना बाकी है।



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फोटो पिछले साल अक्टूबर की है। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर के राजौरी में जवानों के साथ दिवाली मनाई थी।


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Dainik Bhaskar पाकिस्तान में कोरोना मरीजों के इलाज के लिए इस्तेमाल ब्लडप्लाज्मा पैसे कमाने का बड़ा जरिया बनता जा रहा है। यहां ठीक हुए कोरोना मरीज अपना एक बोतल प्लाज्मा 95 हजार रुपए तक में बेच रहे हैं। इस्लामाबाद के मोहम्मद साजिद ने कहा कि उन्होंने कोरोना पीड़ित अपने बेटे के इलाज के लिए बहुत ज्यादाकीमत में ठीक हुए मरीज का प्लाज्मा खरीदा। उनके पास और कोई विकल्प नहीं था। इस्लामाबाद में एयरफोर्स हॉस्पिटल की मेडिकल अधिकारी डॉ. सोबिया अली ने कहा कि प्लाज्मा दान करना चाहिए। स्वास्थ्य मंत्रालय सुनिश्चित करे कि इसमें कालाबाजारी न हो। प्लाज्मा बेचने वाले लोगों और ब्लड बैंक पर निगरानी रखी जानी चाहिए। हम कोरोना से युद्ध के दौर से गुजर रहे हैं। वे लोग भाग्यशाली हैं जो इस बीमारी से ठीक हो चुके हैं। एक नागरिक सारा भुट्‌टा ने ट्वीट किया कि लोग पैसों के लिए अपना प्लाज्मा बेच रहे हैं। इंसानियत मर गई है। हालांकि, लाहौर के व्यवसायी शोएब अहमद कहते हैं कि प्लाज्मा बेचना गलत नहीं है। लॉकडाउन पूरी तरह से फेल हो गया पाकिस्तान में लोगों ने कोरोना पर शुरू से गंभीरता से ध्यान नहीं दिया था। अब यह यहां बेकाबू हो गया है। सरकार ने भी लॉकडाउन के जरिए रोकथाम में रुचि नहीं दिखाई। पाकिस्तान में मई में लॉकडाउन लगाया गया था, जो सफल साबित नहीं हुआ। विशेषज्ञों ने प्रधानमंत्री इमरान खान को वैसा ही लॉकडाउन करने की सलाह दी थी, जैसा भारत में लगाया गया। डब्ल्यूएचओ ने भी पूर्ण लॉकडाउन की सलाह दी थी। इमरान ने सलाह नहीं मानी। पीएम इमरान खान खुद भ्रमित इमरान तो यह भी कह चुके हैं कि 90 फीसदी कोरोना के मामले सामान्य बुखार हैं। ये बिना इलाज के ठीक हो जाएंगे। इस पर इस्लामाबाद में इकरा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में सामाजिक विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर इश्फाक अहमद ने कहा कि प्रधानमंत्री इमरान भ्रमित हैं। दूसरी ओर प्रधानमंत्री के स्वास्थ्य मामलों के सलाहकार डॉ. जफर मिर्जा ने कहा कि सरकार को अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों में तालमेल रखते हुए कदम उठाने की सलाह दी गई है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार धार्मिक नेताओं के दबाव में कोरोना पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रही है। इस्लामी धर्म गुरु ने बोला था- ये पापों का नतीजा है पाकिस्तान के इस्लामी धर्मगुरु मौलाना तारिक जमील दावा कर चुके हैं कि कोरोना पापों पर खुदा के गुस्से का नतीजा है क्योंकि महिलाएं नाचती हैं और अभद्र कपड़े पहनती हैं। एक स्थानीय सर्वे में खुलासा हुआ है कि सिर्फ 3 फीसदी पाकिस्तानी मानते हैं कि कोरोनावायरस मौजूद है और इससे निपटने का तरीका स्पष्ट है। बाकी लोग इसे मुस्लिमों के खिलाफ साजिश मानते हैं। एक लाख से ज्यादा लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए पाकिस्तान में कोरोना के अब तक 1 लाख 85 हजार 34 मरीज मिले हैं। जबकि इससे 3,695 मौतें हुई हैं। यहां के अस्पतालों में प्रति 10 हजार लोगों पर सिर्फ 6 बेड हैं। निजी अस्पतालों में डॉक्टरों को 15 हजार से 25 हजार और सरकारी अस्पतालों में 70 हजार से 78 हजार रुपए सैलरी मिलती है। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें कराची के अस्पताल में डॉक्टर संदिग्ध मरीज के स्वाब का सैपल ले रहे हैं। पाकिस्तान में रोज 20 हजार टेस्ट किए जा रहे हैं। दैनिक भास्कर,,1733 https://ift.tt/2BzdVcZ https://ift.tt/2No9RyL Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf मरीजों की मदद करने की बजाय कारोबार करने लगे कोरोना से ठीक हुए मरीज, 95 हजार रुपए में बेच रहे प्लाज्मा

पाकिस्तान में कोरोना मरीजों के इलाज के लिए इस्तेमाल ब्लडप्लाज्मा पैसे कमाने का बड़ा जरिया बनता जा रहा है। यहां ठीक हुए कोरोना मरीज अपना एक बोतल प्लाज्मा 95 हजार रुपए तक में बेच रहे हैं। इस्लामाबाद के मोहम्मद साजिद ने कहा कि उन्होंने कोरोना पीड़ित अपने बेटे के इलाज के लिए बहुत ज्यादाकीमत में ठीक हुए मरीज का प्लाज्मा खरीदा। उनके पास और कोई विकल्प नहीं था।

इस्लामाबाद में एयरफोर्स हॉस्पिटल की मेडिकल अधिकारी डॉ. सोबिया अली ने कहा कि प्लाज्मा दान करना चाहिए। स्वास्थ्य मंत्रालय सुनिश्चित करे कि इसमें कालाबाजारी न हो। प्लाज्मा बेचने वाले लोगों और ब्लड बैंक पर निगरानी रखी जानी चाहिए। हम कोरोना से युद्ध के दौर से गुजर रहे हैं। वे लोग भाग्यशाली हैं जो इस बीमारी से ठीक हो चुके हैं।

एक नागरिक सारा भुट्‌टा ने ट्वीट किया कि लोग पैसों के लिए अपना प्लाज्मा बेच रहे हैं। इंसानियत मर गई है। हालांकि, लाहौर के व्यवसायी शोएब अहमद कहते हैं कि प्लाज्मा बेचना गलत नहीं है।

लॉकडाउन पूरी तरह से फेल हो गया

पाकिस्तान में लोगों ने कोरोना पर शुरू से गंभीरता से ध्यान नहीं दिया था। अब यह यहां बेकाबू हो गया है। सरकार ने भी लॉकडाउन के जरिए रोकथाम में रुचि नहीं दिखाई। पाकिस्तान में मई में लॉकडाउन लगाया गया था, जो सफल साबित नहीं हुआ। विशेषज्ञों ने प्रधानमंत्री इमरान खान को वैसा ही लॉकडाउन करने की सलाह दी थी, जैसा भारत में लगाया गया। डब्ल्यूएचओ ने भी पूर्ण लॉकडाउन की सलाह दी थी। इमरान ने सलाह नहीं मानी।

पीएम इमरान खान खुद भ्रमित

इमरान तो यह भी कह चुके हैं कि 90 फीसदी कोरोना के मामले सामान्य बुखार हैं। ये बिना इलाज के ठीक हो जाएंगे। इस पर इस्लामाबाद में इकरा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में सामाजिक विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर इश्फाक अहमद ने कहा कि प्रधानमंत्री इमरान भ्रमित हैं।

दूसरी ओर प्रधानमंत्री के स्वास्थ्य मामलों के सलाहकार डॉ. जफर मिर्जा ने कहा कि सरकार को अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों में तालमेल रखते हुए कदम उठाने की सलाह दी गई है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार धार्मिक नेताओं के दबाव में कोरोना पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रही है।

इस्लामी धर्म गुरु ने बोला था- ये पापों का नतीजा है

पाकिस्तान के इस्लामी धर्मगुरु मौलाना तारिक जमील दावा कर चुके हैं कि कोरोना पापों पर खुदा के गुस्से का नतीजा है क्योंकि महिलाएं नाचती हैं और अभद्र कपड़े पहनती हैं। एक स्थानीय सर्वे में खुलासा हुआ है कि सिर्फ 3 फीसदी पाकिस्तानी मानते हैं कि कोरोनावायरस मौजूद है और इससे निपटने का तरीका स्पष्ट है। बाकी लोग इसे मुस्लिमों के खिलाफ साजिश मानते हैं।

एक लाख से ज्यादा लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए

पाकिस्तान में कोरोना के अब तक 1 लाख 85 हजार 34 मरीज मिले हैं। जबकि इससे 3,695 मौतें हुई हैं। यहां के अस्पतालों में प्रति 10 हजार लोगों पर सिर्फ 6 बेड हैं। निजी अस्पतालों में डॉक्टरों को 15 हजार से 25 हजार और सरकारी अस्पतालों में 70 हजार से 78 हजार रुपए सैलरी मिलती है।



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कराची के अस्पताल में डॉक्टर संदिग्ध मरीज के स्वाब का सैपल ले रहे हैं। पाकिस्तान में रोज 20 हजार टेस्ट किए जा रहे हैं।


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Dainik Bhaskar महिला क्रिकेट को रोमांचक बनाने के लिए नियम में कुछ अहम बदलाव हो सकते हैं। इसमें छोटी-हल्की गेंद का प्रयोग और छोटी पिच जैसी बातें शामिल हैं। पिछले दिनों आईसीसी ने वेबिनार आयोजित किया था। इसमें न्यूजीलैंड की कप्तान सोफिया डिवाइन और भारत की जेमिमा रोड्रिग्ज ने इस तरह के सुझाव दिए थे। पिच को 22 यार्ड की जगह 20 यार्ड किया जा सकता है। ऐसे ही प्रस्ताव पर अन्य बड़ी क्रिकेटरों ने राय दी है। उनकी बात के मुख्य अंश: क्या पिच को छोटा करने से महिला क्रिकेट को फैंस के लिहाज से और रोमांचक बनाया जा सकता है? स्मृति मंधाना (भारतीय बल्लेबाज) : महिला और पुरुष क्रिकेट की बात की जाए तो दाेनों में सिर्फ पिच की साइज बराबर है। महिला क्रिकेट में गेंद का भार 140-151 ग्राम जबकि पुरुष में 155.9-163 ग्राम होता है। पिच काे छोटा करना फैंस के लिहाज से अच्छा हो सकता है। वर्तमान में महिला क्रिकेट में गेंदबाजों की अधिकतम स्पीड 120-125 किमी प्रति घंटा है। यदि पिच छोटी होती है तो स्पीड 130-135 किमी प्रति घंटा हो जाएगी। तेज गेंदबाजी हमेशा देखने लायक होती है। रेचल हेंस (ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज): गेंदबाजों को मदद मिलेगी। लेकिन इसके लिए खेल के अन्य दृष्टिकोण देखने होंगे। जैसे विकेट का नेचर- अच्छी घास, क्रैक्स, घास नहीं। इसके अलावा लोकल कंडीशन देखनी होगी। ली ताहुहु (न्यूजीलैंड की तेज गेंदबाज): मेरे हिसाब से यह ठीक नहीं है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि गेंद बल्लेबाजों के पास तेजी से जाए। हालांकि इससे गेंद और बल्ले के बीच अच्छी लड़ाई देखने को मिल सकती है। निदा डार (पाकिस्तान की ऑफ स्पिनर): मेरे हिसाब से पिच की लंबाई ठीक है। इससे बल्लेबाजों को फायदा मिलेगा। वे क्रीज की डेप्थ का अधिक उपयोग करेंगे क्योंकि मैदान का आकार छोटा होता है। केटी क्राॅस (इंग्लैंड की तेज गेंदबाज): ऐसे बदलाव की जरूरत नहीं है। हमें अच्छे स्टेडियम, बड़े मैदान और भरे हुए स्टेडियम में मैच कराने की जरूरत है। ग्राउंड स्टाफ के लिए इस तरह का काम मुश्किल होगा। छोटी गेंद अच्छे से पकड़ में आएगी, ऐसे में स्पिनरों को मदद मिलेगी मंधाना: कई खिलाड़ियों की हथेली छोटी होती है। पूनम की हथेली और छोटी है। कैच लेने में दिक्कत होती है। इसे लागू किया जा सकता है। हेंस: अच्छे स्पिनर के हाथ गेंद पर सेट हैंं। लेकिन यदि आप ऐसी पिच पर खेलते हैं जहां स्पिन को कम मदद मिलती है। ऐसे में इसे आजमा सकते हैं। ताहुहु: गेंद छोटी करना मेरी समझ से परे है। छोटी गेंद होने से स्पिनर इसे अच्छे से पकड़ सकेंगे, जिससे उन्हें स्पिन कराने में मदद मिलेगी। डार: हल्की गेंद से स्पिनर अधिक ड्रिफ्ट करेंगी। स्पिनर और प्रभावी होंगी, छक्का मारना आसान नहीं होगा। बदलाव गेंदबाजों के पक्ष में रहेगा। केटी: यह एक अच्छा उपाय है। महिलाओं के हाथ का आकार पुरुषों की अपेक्षा कम होता है। साइज से ज्यादा प्रभाव भार में बदलाव का होगा। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें बॉल के साथ पिच को भी पिच को 22 यार्ड की जगह 20 यार्ड किया जा सकता है। (फाइल) दैनिक भास्कर,,1733 https://ift.tt/3hYkXsc https://ift.tt/3hRvLIV Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf महिला क्रिकेट को राेचक बनाने के लिए नियम में हो सकते हैं अहम बदलाव, गेंद हल्की और पिच छोटी की जा सकती है

महिला क्रिकेट को रोमांचक बनाने के लिए नियम में कुछ अहम बदलाव हो सकते हैं। इसमें छोटी-हल्की गेंद का प्रयोग और छोटी पिच जैसी बातें शामिल हैं। पिछले दिनों आईसीसी ने वेबिनार आयोजित किया था। इसमें न्यूजीलैंड की कप्तान सोफिया डिवाइन और भारत की जेमिमा रोड्रिग्ज ने इस तरह के सुझाव दिए थे। पिच को 22 यार्ड की जगह 20 यार्ड किया जा सकता है। ऐसे ही प्रस्ताव पर अन्य बड़ी क्रिकेटरों ने राय
दी है। उनकी बात के मुख्य अंश:

क्या पिच को छोटा करने से महिला क्रिकेट को फैंस के लिहाज से और रोमांचक बनाया जा सकता है?

  • स्मृति मंधाना (भारतीय बल्लेबाज) : महिला और पुरुष क्रिकेट की बात की जाए तो दाेनों में सिर्फ पिच की साइज बराबर है। महिला क्रिकेट में गेंद का भार 140-151 ग्राम जबकि पुरुष में 155.9-163 ग्राम होता है। पिच काे छोटा करना फैंस के लिहाज से अच्छा हो सकता है। वर्तमान में महिला क्रिकेट में गेंदबाजों की अधिकतम स्पीड 120-125 किमी प्रति घंटा है। यदि पिच छोटी होती है तो स्पीड 130-135 किमी प्रति घंटा हो जाएगी। तेज गेंदबाजी हमेशा देखने लायक होती है।
  • रेचल हेंस (ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज): गेंदबाजों को मदद मिलेगी। लेकिन इसके लिए खेल के अन्य दृष्टिकोण देखने होंगे। जैसे विकेट का नेचर- अच्छी घास, क्रैक्स, घास नहीं। इसके अलावा लोकल कंडीशन देखनी होगी।
  • ली ताहुहु (न्यूजीलैंड की तेज गेंदबाज): मेरे हिसाब से यह ठीक नहीं है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि गेंद बल्लेबाजों के पास तेजी से जाए। हालांकि इससे गेंद और बल्ले के बीच अच्छी लड़ाई देखने को मिल सकती है।
  • निदा डार (पाकिस्तान की ऑफ स्पिनर): मेरे हिसाब से पिच की लंबाई ठीक है। इससे बल्लेबाजों को फायदा मिलेगा। वे क्रीज की डेप्थ का अधिक उपयोग करेंगे क्योंकि मैदान का आकार छोटा होता है।
  • केटी क्राॅस (इंग्लैंड की तेज गेंदबाज): ऐसे बदलाव की जरूरत नहीं है। हमें अच्छे स्टेडियम, बड़े मैदान और भरे हुए स्टेडियम में मैच कराने की जरूरत है। ग्राउंड स्टाफ के लिए इस तरह का काम मुश्किल होगा।

छोटी गेंद अच्छे से पकड़ में आएगी, ऐसे में स्पिनरों को मदद मिलेगी

  • मंधाना: कई खिलाड़ियों की हथेली छोटी होती है। पूनम की हथेली और छोटी है। कैच लेने में दिक्कत होती है। इसे लागू किया जा सकता है।
  • हेंस: अच्छे स्पिनर के हाथ गेंद पर सेट हैंं। लेकिन यदि आप ऐसी पिच पर खेलते हैं जहां स्पिन को कम मदद मिलती है। ऐसे में इसे आजमा सकते हैं।
  • ताहुहु: गेंद छोटी करना मेरी समझ से परे है। छोटी गेंद होने से स्पिनर इसे अच्छे से पकड़ सकेंगे, जिससे उन्हें स्पिन कराने में मदद मिलेगी।
  • डार: हल्की गेंद से स्पिनर अधिक ड्रिफ्ट करेंगी। स्पिनर और प्रभावी होंगी, छक्का मारना आसान नहीं होगा। बदलाव गेंदबाजों के पक्ष में रहेगा।
  • केटी: यह एक अच्छा उपाय है। महिलाओं के हाथ का आकार पुरुषों की अपेक्षा कम होता है। साइज से ज्यादा प्रभाव भार में बदलाव का होगा।


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बॉल के साथ पिच को भी पिच को 22 यार्ड की जगह 20 यार्ड किया जा सकता है। (फाइल)


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Dainik Bhaskar कांग्रेस में राहुल गांधी को एक बार फिर पार्टीअध्यक्ष बनाने की मांग तेज हो गई है। कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) कीवर्चुअल मीटिंग में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशाेक गहलाेत ने राहुल को पार्टी की कमान सौंपने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को देश की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस की बागडोर संभालनी चाहिए। इसके बाद हरीश रावत समेत ज्यादातर नेताओं ने इस प्रस्ताव कासमर्थन किया। हालांकि खुद राहुल और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।राहुलने लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। मंगलवार को सीडब्ल्यूसी की बैठक में तीन प्रस्ताव पारित हुए और देश के मौजूदा राजनीतिक हालात पर विस्तार से चर्चा हुई। लद्दाख पर सरकार- विपक्ष में टकराव लद्दाख सीमा विवाद परसोनिया ने कहा कि भारत-चीन सीमा विवाद, कोरोना और अर्थव्यवस्था से जुड़े संकट का मुख्य कारण एनडीए सरकार का कुप्रबंधन और उसकी गलत नीतियां हैं। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अप्रैल-मई 2020 से लेकर अब तक चीनी सेना ने पैंगोंग त्सो झील और गलवान घाटी में घुसपैठ की है। इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान ने देश को झकझोर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी ने भी लद्दाख में भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ नहीं की। लॉकडाउन पर सोनिया ने कहा कि आर्थिक संकट और गहरा गया है। यह 1947-48 के बाद सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी बन गई। करोड़ों प्रवासी मजदूर, दैनिक कर्मचारियों की रोजी-रोटी तबाह हो गई। राहुल ने कहा कि चीन ने बड़ी ढिठाई से हमारे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। प्रधानमंत्री ने चीन के इस रुख को स्वीकार करके हमारे रुख को नष्ट कर दिया। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल पर निशाना साधा नड्डा ने एक ट्वीट में कहा कि कांग्रेस पहले चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करती है। फिर वह चीन को जमीन सौंप देती है। डोकलाम मुद्दे के दौरान राहुल गुपचुप तरीके से चीनी दूतावास जाते हैं। नाजुक स्थितियों में राहुल देश को बांटने और सशस्त्र बलों का मनोबल गिराने की कोशिश करते हैं। क्या ये सब एमओयू का प्रभाव है। कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अहम क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक दूसरे से परामर्श और उच्च स्तरीय संपर्क को लेकर 2008 में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मांग पर खुद राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। दैनिक भास्कर,,1733 https://ift.tt/2YqME5i https://ift.tt/3hVFTAo Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf गहलोत ने कहा- देश की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडोर संभालनी चाहिए

कांग्रेस में राहुल गांधी को एक बार फिर पार्टीअध्यक्ष बनाने की मांग तेज हो गई है। कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) कीवर्चुअल मीटिंग में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशाेक गहलाेत ने राहुल को पार्टी की कमान सौंपने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को देश की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस की बागडोर संभालनी चाहिए। इसके बाद हरीश रावत समेत ज्यादातर नेताओं ने इस प्रस्ताव कासमर्थन किया।

हालांकि खुद राहुल और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।राहुलने लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। मंगलवार को सीडब्ल्यूसी की बैठक में तीन प्रस्ताव पारित हुए और देश के मौजूदा राजनीतिक हालात पर विस्तार से चर्चा हुई।

लद्दाख पर सरकार- विपक्ष में टकराव

लद्दाख सीमा विवाद परसोनिया ने कहा कि भारत-चीन सीमा विवाद, कोरोना और अर्थव्यवस्था से जुड़े संकट का मुख्य कारण एनडीए सरकार का कुप्रबंधन और उसकी गलत नीतियां हैं। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अप्रैल-मई 2020 से लेकर अब तक चीनी सेना ने पैंगोंग त्सो झील और गलवान घाटी में घुसपैठ की है। इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान ने देश को झकझोर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी ने भी लद्दाख में भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ नहीं की।

लॉकडाउन पर सोनिया ने कहा कि आर्थिक संकट और गहरा गया है। यह 1947-48 के बाद सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी बन गई। करोड़ों प्रवासी मजदूर, दैनिक कर्मचारियों की रोजी-रोटी तबाह हो गई। राहुल ने कहा कि चीन ने बड़ी ढिठाई से हमारे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। प्रधानमंत्री ने चीन के इस रुख को स्वीकार करके हमारे रुख को नष्ट कर दिया।

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल पर निशाना साधा

नड्डा ने एक ट्वीट में कहा कि कांग्रेस पहले चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करती है। फिर वह चीन को जमीन सौंप देती है। डोकलाम मुद्दे के दौरान राहुल गुपचुप तरीके से चीनी दूतावास जाते हैं। नाजुक स्थितियों में राहुल देश को बांटने और सशस्त्र बलों का मनोबल गिराने की कोशिश करते हैं। क्या ये सब एमओयू का प्रभाव है। कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अहम क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक दूसरे से परामर्श और उच्च स्तरीय संपर्क को लेकर 2008 में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे।



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राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मांग पर खुद राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।


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Dainik Bhaskar मानसून सत्र के लिए जब उच्च सदन राज्यसभा की कार्यवाही शुरू होगी, तो इसका स्वरूप कुछ बदला हुआ होगा। पहली बार सदन में एनडीए के 100 से ज्यादा सदस्य होंगे। लेकिन नए सदस्यों के शपथ पत्रों का विश्लेषण करें, तो पता चलता है कि राज्यसभा के लिए निर्वाचित 62 नए सांसदों में से 44% ने उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी दी है। इनमें 16 (26%) के खिलाफ सामान्य आपराधिक मामले, जबकि 11 (18%) के खिलाफ हत्या, हत्या का प्रयास, दुष्कर्म, डकैती और चोरी जैसे गंभीर अपराधों के आरोप हैं। 2577 करोड़ की संपत्ति वाले अल्ला अयोध्या सबसे अमीर आंध्र प्रदेश से चुने गए वाईएसआर कांग्रेस के अल्ला अयोध्या रामी रेड्डी सबसे अमीर हैं। उनके पास करीब 2577 करोड़ की संपत्ति है। मणिपुर से निर्वाचित भाजपा सांसद महाराजा संजाओबा लिशेम्बा की संपत्ति सबसे कम (5,48,594 रु.) है। सांसद पार्टी निर्वाचन क्षेत्र संपत्ति (रुपए में) अल्ला अयोध्या रामी रेड्डी वाईएसआरसी आंध्र प्रदेश 2577 करोड़ परिमल नथवानी वाईएसआरसी आंध्र प्रदेश 396 करोड़ ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा मध्यप्रदेश 379 करोड़ भाजपा के महाराजा संजाओबा लिशेम्बा के पास सबसे कम संपत्ति सांसद पार्टी निर्वाचन क्षेत्र संपत्ति (रुपए में) महाराजा संजाओबा लिशेम्बा भाजपा मणिपुर 5.48 लाख अशोक गस्ती भाजपा कर्नाटक 19.40 लाख अर्पिता घोष तृणमूल प. बंगाल 23.89 लाख आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें Criminal cases on 44% of the 62 new members of Rajya Sabha, including 33% of Congress, 11% of BJP and both NCP MPs दैनिक भास्कर,,1733 https://ift.tt/3hXkdDK https://ift.tt/2NnLlxV Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf राज्यसभा के 62 नए सदस्यों में से 44% पर आपराधिक मामले, इनमें कांग्रेस के 33%, भाजपा के 11% और एनसीपी के दोनों सांसद शामिल

मानसून सत्र के लिए जब उच्च सदन राज्यसभा की कार्यवाही शुरू होगी, तो इसका स्वरूप कुछ बदला हुआ होगा। पहली बार सदन में एनडीए के 100 से ज्यादा सदस्य होंगे। लेकिन नए सदस्यों के शपथ पत्रों का विश्लेषण करें, तो पता चलता है कि राज्यसभा के लिए निर्वाचित 62 नए सांसदों में से 44% ने उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी दी है।

इनमें 16 (26%) के खिलाफ सामान्य आपराधिक मामले, जबकि 11 (18%) के खिलाफ हत्या, हत्या का प्रयास, दुष्कर्म, डकैती और चोरी जैसे गंभीर अपराधों के आरोप हैं।

2577 करोड़ की संपत्ति वाले अल्ला अयोध्या सबसे अमीर
आंध्र प्रदेश से चुने गए वाईएसआर कांग्रेस के अल्ला अयोध्या रामी रेड्डी सबसे अमीर हैं। उनके पास करीब 2577 करोड़ की संपत्ति है। मणिपुर से निर्वाचित भाजपा सांसद महाराजा संजाओबा लिशेम्बा की संपत्ति सबसे कम (5,48,594 रु.) है।

सांसद पार्टी निर्वाचन क्षेत्र संपत्ति (रुपए में)
अल्ला अयोध्या रामी रेड्डी वाईएसआरसी आंध्र प्रदेश 2577 करोड़
परिमल नथवानी वाईएसआरसी आंध्र प्रदेश 396 करोड़
ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा मध्यप्रदेश 379 करोड़


भाजपा के महाराजा संजाओबा लिशेम्बा के पास सबसे कम संपत्ति

सांसद पार्टी निर्वाचन क्षेत्र संपत्ति (रुपए में)
महाराजा संजाओबा लिशेम्बा भाजपा मणिपुर 5.48 लाख
अशोक गस्ती भाजपा कर्नाटक 19.40 लाख
अर्पिता घोष तृणमूल प. बंगाल 23.89 लाख


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Criminal cases on 44% of the 62 new members of Rajya Sabha, including 33% of Congress, 11% of BJP and both NCP MPs


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Dainik Bhaskar कांग्रेस में राहुल गांधी को एक बार फिर पार्टीअध्यक्ष बनाने की मांग तेज हो गई है। कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) कीवर्चुअल मीटिंग में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशाेक गहलाेत ने राहुल को पार्टी की कमान सौंपने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को देश की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस की बागडोर संभालनी चाहिए। इसके बाद हरीश रावत समेत ज्यादातर नेताओं ने इस प्रस्ताव कासमर्थन किया। हालांकि खुद राहुल और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।राहुलने लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। मंगलवार को सीडब्ल्यूसी की बैठक में तीन प्रस्ताव पारित हुए और देश के मौजूदा राजनीतिक हालात पर विस्तार से चर्चा हुई। लद्दाख पर सरकार- विपक्ष में टकराव लद्दाख सीमा विवाद परसोनिया ने कहा कि भारत-चीन सीमा विवाद, कोरोना और अर्थव्यवस्था से जुड़े संकट का मुख्य कारण एनडीए सरकार का कुप्रबंधन और उसकी गलत नीतियां हैं। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अप्रैल-मई 2020 से लेकर अब तक चीनी सेना ने पैंगोंग त्सो झील और गलवान घाटी में घुसपैठ की है। इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान ने देश को झकझोर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी ने भी लद्दाख में भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ नहीं की। लॉकडाउन पर सोनिया ने कहा कि आर्थिक संकट और गहरा गया है। यह 1947-48 के बाद सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी बन गई। करोड़ों प्रवासी मजदूर, दैनिक कर्मचारियों की रोजी-रोटी तबाह हो गई। राहुल ने कहा कि चीन ने बड़ी ढिठाई से हमारे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। प्रधानमंत्री ने चीन के इस रुख को स्वीकार करके हमारे रुख को नष्ट कर दिया। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल पर निशाना साधा नड्डा ने एक ट्वीट में कहा कि कांग्रेस पहले चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करती है। फिर वह चीन को जमीन सौंप देती है। डोकलाम मुद्दे के दौरान राहुल गुपचुप तरीके से चीनी दूतावास जाते हैं। नाजुक स्थितियों में राहुल देश को बांटने और सशस्त्र बलों का मनोबल गिराने की कोशिश करते हैं। क्या ये सब एमओयू का प्रभाव है। कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अहम क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक दूसरे से परामर्श और उच्च स्तरीय संपर्क को लेकर 2008 में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मांग पर खुद राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। दैनिक भास्कर,,1733 /local/rajasthan/jaipur/news/chief-minister-ashok-gehlot-proposed-to-make-rahul-president-127440970.html https://ift.tt/3dtj2sf Dainik Bhaskar https://ift.tt/1PKwoAf गहलोत ने कहा- देश की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडोर संभालनी चाहिए

कांग्रेस में राहुल गांधी को एक बार फिर पार्टीअध्यक्ष बनाने की मांग तेज हो गई है। कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) कीवर्चुअल मीटिंग में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशाेक गहलाेत ने राहुल को पार्टी की कमान सौंपने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को देश की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस की बागडोर संभालनी चाहिए। इसके बाद हरीश रावत समेत ज्यादातर नेताओं ने इस प्रस्ताव कासमर्थन किया।

हालांकि खुद राहुल और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।राहुलने लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। मंगलवार को सीडब्ल्यूसी की बैठक में तीन प्रस्ताव पारित हुए और देश के मौजूदा राजनीतिक हालात पर विस्तार से चर्चा हुई।

लद्दाख पर सरकार- विपक्ष में टकराव

लद्दाख सीमा विवाद परसोनिया ने कहा कि भारत-चीन सीमा विवाद, कोरोना और अर्थव्यवस्था से जुड़े संकट का मुख्य कारण एनडीए सरकार का कुप्रबंधन और उसकी गलत नीतियां हैं। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अप्रैल-मई 2020 से लेकर अब तक चीनी सेना ने पैंगोंग त्सो झील और गलवान घाटी में घुसपैठ की है। इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान ने देश को झकझोर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी ने भी लद्दाख में भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ नहीं की।

लॉकडाउन पर सोनिया ने कहा कि आर्थिक संकट और गहरा गया है। यह 1947-48 के बाद सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी बन गई। करोड़ों प्रवासी मजदूर, दैनिक कर्मचारियों की रोजी-रोटी तबाह हो गई। राहुल ने कहा कि चीन ने बड़ी ढिठाई से हमारे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। प्रधानमंत्री ने चीन के इस रुख को स्वीकार करके हमारे रुख को नष्ट कर दिया।

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल पर निशाना साधा

नड्डा ने एक ट्वीट में कहा कि कांग्रेस पहले चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करती है। फिर वह चीन को जमीन सौंप देती है। डोकलाम मुद्दे के दौरान राहुल गुपचुप तरीके से चीनी दूतावास जाते हैं। नाजुक स्थितियों में राहुल देश को बांटने और सशस्त्र बलों का मनोबल गिराने की कोशिश करते हैं। क्या ये सब एमओयू का प्रभाव है। कांग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अहम क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक दूसरे से परामर्श और उच्च स्तरीय संपर्क को लेकर 2008 में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे।



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राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मांग पर खुद राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।


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Bihar Assembly Election 2020: पार्टी में टूट से परेशान RJD पर JDU ने कसा तंज, तो बीजेपी ने ली चुटकी

जैसे जैसे बिहार विधान सभा की आहट बढ़ती जा रही है वैसे वैसे बिहार के राजनीतिक गलियारों में हलचल भी बढ़ गई है. और अब यह सवाल उठने लगा है कि क्...